गेस्ट रिपोर्ट : कश्मीर और कश्मीरी : लगाव से अलगाव तक ! Part-1

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कश्मीर की बातेंं किस्तों में…

देश के सिनियर जर्नलिस्ट, मुकेश कुमार की कलम से

[हम लाख दावा करते रहें मगर यही कड़वा सच है कि हमारे साथ कश्मीर तो है, मगर कश्मीरी नहीं हैं। 26 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर का विलय भले ही हो गया था मगर भारत के साथ उसका एकीकरण आज तक ठीक से हो नहीं पाया है। न राजनीतिक स्तर पर वह जुड़ पाया और न ही भावनात्मक स्तर पर। दुखद बात ये है कि हम लगातार उन्हें अपने से दूर करते रहे है। कभी सांप्रदायिक राजनीति ने फ़ासले बढ़ाए तो कभी पाकिस्तान की मदद से जिहादियों ने हमारे दरम्याँ खाईयाँ खोद दीं। कश्मीरियों से किए गए वायदों को निभाने में भी दिल्ली नाक़ाम रही। यही नहीं, निष्पक्ष चुनाव जैसी मामूली मगर बुनियादी शर्त को भी पूरा नहीं किया गया। राजनीतिक समाधान की एक उम्मीद थी जो एक डोर से हमें बाँधे रखती थी, लेकिन मोदी सरकार की नीतियों ने उसे भी तोड़ दिया है। अब निराशा है, अंधकार है और दूरियाँ ही दूरियाँ हैं। ]

कश्मीर ! किस मुकाम पर, इसे समझिए…

डल झील का पानी खौल रहा है, चिनार के पेड़ों में आग लगी है और हवाएं बेहद, बेहद गरम। फिज़ा में खौफ़ के साथ-साथ ताज़े बारूद की गंध और महसूस की जा सकती है। सड़कों पर जब-तब लहू के नए-पुराने धब्बे देखे जा सकते हैं। बच्चों से बूढ़ों तक के हाथों में पत्थर हैं और ज़ुबान पर आज़ादी के नारे। ये दुनिया में सबसे ज़्यादा सैनिकों की मौजूदगी वाला इलाक़ा है। हर दिन यहाँ टकराव और मुठभेड़े हैं और हर दिन लोग मारे जा रहे हैं। मरने वालों में दहशतगर्द भी हैं, सुरक्षा बल के जवान भी हैं और आम अवाम भी। 
ये मंजर देखकर समझना मुश्किल नहीं है कि धरती पर स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर इस समय किस मुकाम पर खड़ा है और कश्मीरी किस दौर से गुज़र रहे होंगे। ऐसा लगता है कि वे एक अँधेरी बंद सुरंग में खड़े हैं और अमन-चैन की कोई धुँधली सी भी किरण सालों से फैले अँधेरे को चीरती नहीं दिखती। दूर तक नाउम्मीदी ही नाउम्मीदी है जो बेचैनी और तशद्दुद को बढ़ा रही है। पिछले पाँच साल तो और भी भयानक साबित हुए हैं। कुछ दानिशमंदों को यक़ीन था कि दिल्ली में पूर्ण बहुमत के साथ एक दक्षिणपंथी सरकार का बनना समाधान के लिए मुफ़ीद साबित होगा क्योंकि वह हिंदू अतिवादियों को साथ रखकर कोई सुलह तक पहुँचने में कामयाब हो सकती है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हालात बिगड़ते चले गए और इस कदर बिगड़ते चले गए कि जंग का ख़तरा मँडराने लगा है। 

अब क्या है आलम, कितनी उम्मीदें

दुनिया इन दिनों के लिए कश्मीरियों के अलगाव पर एक लंबा लेख लिखा है। आपको इसमें पूरे तथ्यों के साथ एक ऐतिहासिक…

Posted by Mukesh Kumar on Sunday, April 7, 2019


आलम ये है कि अब अमन की उम्मीद वे भी नहीं कर पा रहे जो हर हाल में आशावादी रहना चाहते हैं, बाघा बॉर्डर पर जाकर मोमबत्तियाँ जलाते हैं। मौजूदा हुकूमत ने समाधान की एक भी कोशिश नहीं की, शांति की दिशा में एक भी पहल नहीं की, बल्कि ये संदेश तक दे डाला कि उसे कश्मीरियों की कोई परवाह ही नहीं है। वह न केवल संविधान प्रदत्त हुकूक को छीनने के लिए बेताब है बल्कि उसने अविश्वास की इतनी गहरी खाई खोद दी है और प्रतिशोध की इतनी ज्वालाएं भड़का दी हैं कि एक तबका जंग को ही समाधान मानने लगा है। ये तबका हिंसा की ज़ुबान में बोलता है और नफ़रत के गोले उगलता है। ये सत्ताधारी राजनीतिक दल का अंधा भक्त भी है और मीडिया में युद्धोन्माद को भड़काने वाला पत्रकार भी। 
सरकार के उपेक्षा और प्रतिशोध भरे रवैये ने कश्मीरियों को भारत से दूर-बहुत दूर ले जाकर खड़ा कर दिया है। इतना दूर कि अब वि सिवाय आज़ादी के कोई और नारा लगाते हुए नहीं मिलते। उनके तेवरों से ऐसा लगता है कि उन्होंने दिल्ली पर अपना भरोसा पूरी तरह खो दिया है और वे अब हिंदुस्तान के साथ रहना ही नहीं चाहते। पाँच साल पहले परिस्थितियाँ इतनी बदतर नहीं थीं। गुस्सा तब भी था, अलगाव तब भी था मगर इस कदर नहीं कि मेल-मिलाप के सारे पुल ही टूट जाएं। पिछली सभी सरकारें चाहे वे किसी भी पार्टी की रही हों, समाधान की कोशिश करती रही हैं, इसलिए उम्मीद भी बनी रही। अब ऐसा नहीं है। अब तो ऐसा लगता है कि कश्मीर पर हिंदुस्तान का कब्ज़ा है मगर कश्मीरियों को वह खो चुका है। 
—-जारी….

मुकेश कुमार, जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार और लेखक

लेखक परिचय

मुकेश कुमार
देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।

इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया से लंबे समय से जुड़े हैं।
मौर्य टीवी, के निदेशक भी रह चुके हैं। कई नेशनल और रिजनल चैनल से भी जुड़े रहे।
पत्र- पत्रिकाओं में बेवाक लेखनी के लिए जाने जाते हैं। साहित्य से खास लगाव रहा है।