गेस्ट रिपोर्ट : कश्मीर और कश्मीरी:- लगाव से अलगाव तक ! Part-2

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कश्मीर की बातें किस्तों में- पार्ट2 पढिए – गेस्ट रिपोर्ट में।

देश के सिनियर जर्नलिस्ट, मुकेश कुमार की कलम से

70 साल पहले कैसे थे

आज किसी को शायद ही ये यक़ीन हो पाएगा कि एक ऐसा समय भी था जब कश्मीरी अवाम देश के साथ दिल से जुड़े हुए थे। हम सदियों नहीं, बमुश्किल से सत्तर-पचहत्तर साल पुरानी बात कर रहे हैं, जब पूरा हिंदुस्तान अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था। कश्मीर के अवाम भी इस जंग में शामिल थे। महाराजा हरि सिंह के दमनकारी शासन के ख़िलाफ़ तहरीक़ चला रही नेशनल कांफ्रेंस और उनके नेता शेख़ अब्दुल्ला को काँग्रेस का साथ मिल रहा था और वे काँग्रेस के साथ थे, आज़ादी के आंदोलन के साथ थे। महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू से उनके करीबी रिश्ते थे और ये रिश्ते हिंदू-मुसलमान के रिश्तों को भी परिभाषित करते थे। सांप्रदायिक एकता के संदर्भ में इसकी मिसाल दी जाती थी मगर ये भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को आकार देने वाली भी थी। देश आज़ाद होने से कुछ पहले 1-4 अगस्त को महात्मा गाँधी ने जब जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था तो वहाँ उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ था। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने कोई राजनीतिक सभा नहीं की, केवल तीन प्रार्थना सभाएं कीं और इनमें उन्होंने खुशी व्यक्त की कि जब पूरा देश विभाजन की हिंसा से गुज़र रहा है तो कश्मीर शांति और अहिंसा की मिसाल पेश कर रहा है। उन्होंने आज़ादी के आंदोलन में कश्मीरियों के योगदान की भी खुले दिल से तारीफ़ की। राजा हरिसिंह से गाँधीजी की मुलाक़ात के तुरंत बाद ही प्रधानमंत्री रामचंद काक को पद से हटाना पड़ गया था। 

किसने चली कैसी-कैसी चाल !


गाँधी और नेहरू राजशाही के ख़िलाफ़ संघर्ष को नैतिक समर्थन के ज़रिए मज़बूत कर रहे थे। उनको पता था कि हरि सिंह का निज़ाम किस तरह ग़रीब और अनपढ़ मुस्लिम आबादी के साथ भेदभाव भरा बर्ताव कर रहा है। वे इसे ख़त्म होता देखना चाहते थे। उनकी ये नीति अलग पाकिस्तान के लिए की जा रही माँग के बावजूद कश्मीर और कश्मीरियों को बाक़ी भारत से जोड़ रही थी। उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना के दो राष्ट्रों के सिद्धांत को खारिज़ कर दिया था। वे पाकिस्तान का हिस्सा बनने के बजाय हिंदुस्तानी बनने को तरज़ीह दे रहे थे। शेख अब्दुल्ला धर्मनिरपेक्षता और कश्मीरियत को भारत में विलय का आधार मानते थे। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत के पक्ष का बचाव करते हुए कहा था कि वे, उनकी पार्टी और कश्मीरी दो राष्ट्रों के सिद्धांत को नहीं मानते। इस तरह कश्मीर की राजनीतिक लीडरशिप और कश्मीरी जनता दोनों ही भारत के साथ थी। लेकिन इसके ठीक उलट हिंदू राजा हरि सिंह न केवल उनके हक़-ओ-हुकूक देने में आनाकानी कर रहे थे, बल्कि हिंदुस्तान का हिस्सा न बनने की तिकड़मों में भी मुब्तला थे। कभी पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे थे तो कभी आज़ाद मुल्क कायम करने के ख़्वाब देख रहे थे। और ये खेल उन्होंने तब तक खेला जब तक कि कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान द्वारा भेजे गए कबायलियों के कब्ज़े में नहीं चला गया। यही नहीं, विलय के पहले वे सपरिवार अपने प्रधानमंत्री के साथ भाग गए। तब शेख अब्दुल्ला ने स्थानीय लोगों को इकट्ठा करके लड़ाकू दस्ता बनाया और उन्हें श्रीनगर तथा कश्मीर को बचाने के लिए मोर्चे पर लगाया। 

लब्बोलुआब क्या रहा …

कुछ मित्रों का आग्रह है कि कश्मीर पर लंबे लेख को किस्तों में ही सही एक दिन ही साझा कीजिए ताकि उसे लगातार पढ़ा जा सके।…

Posted by Mukesh Kumar on Monday, April 8, 2019


लब्बोलुआब ये कि पाकिस्तानी हमले के दौरान और उसके बाद भी कश्मीरी हिंदुस्तान के हिस्सा थे। भारतीय फौज ने बाक़ी बचे कश्मीर को पाकिस्तान के चंगुल में जाने से बचाया। इसके बाद ही शांति बहाल हुई। अब शेख़ अब्दुल्ला वज़ीर-ए-आज़म थे और कर्ण सिंह सदर-ए-रियासत यानी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति। ये भी महाराजा हरिसिंह ने विलय की शर्तों के तहत करवाया था। इसमें अलग संविधान और अलग झंडा भी शामिल था। हरिसिंह ने बहुत पहले अपनी रियासत में बाहर से आकर बसने वालों के लिए ज़मीन की खरीद पर जो रोक लगाई थी, उसे भी संधि का हिस्सा बना दिया था। कुल मिलाकर यही धारा 370 बनीं जिस पर एक पार्टी लगातार बवाल मचाती रहती है और बदनाम करती है नेहरू और काँग्रेस पार्टी को। ये पार्टी जिस विचारधारा का अनुकरण करती है, उसका बहुत बड़ा योगदान है कश्मीर समस्या को सांप्रदायिक रंग देकर जटिल बनाने में। आज़ादी से बहुत पहले सावरकर की हिंदू राष्ट्र की मुहिम, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियाँ और हिंदू महासभा की राजनीति, इन तीनों ने मिलकर सांप्रदायिक आधार पर अलगाव के जो बीज बोए उन्हें मुस्लिम लीग के दो राष्ट्रों के सिद्धांत ने खूब खाद-पानी दी। हिंदुत्ववादी बहुसंख्यकवाद किसी भी तौर पर कश्मीर का विशेष दर्ज़ा बर्दाश्त नहीं कर पाया और इसकी कोई राष्ट्रवादी वजह नहीं थी, बल्कि वह विशुद्ध रूप से सांप्रदायिक द्वेष से प्रेरित था।

……..जारी………

लेखक परिचय

मुकेश कुमार
देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।
 
इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया से लंबे समय से जुड़े हैं। 
मौर्य टीवी, के निदेशक भी रह चुके हैं। कई नेशनल और रिजनल चैनल से भी जुड़े रहे।
पत्र- पत्रिकाओं में बेवाक लेखनी के लिए जाने जाते हैं। साहित्य से खास लगाव रहा है।