जहां एक ही पहाड़ी पर है चारधाम…!

0
755

नामची, सिक्किम के सोलोफोक पहाड़ी से लाइव रिपोर्ट

मौर्य न्यूज18 संवाददाता मनोरंजन सहाय की पहाड़ी से खास रिपोर्ट

जानकारी से भरपूर खास रपट जरूर पढ़ें

मौर्य न्यूज18 आपको इंडिया के उन खूबसूरत और प्रसिद्द धार्मिक स्थलों से अवगत करा रहा है जिसे शायद बहुत कम लोग जानते होंगे। यदि किसी से सुना भी होगा तो उसे अब जान भी लें तस्वीर के साथ हम रिपोर्ट पेश कर रहे हैं। हमारी मौर्य टीम की ओर से इस रिपोर्ट के लिए खास संवाददाता मनोरंजन सिन्हा ने इस स्थल की यात्रा की फिर जो वहां जाना-समझा उसे प्रस्तुत कर रहा हूं। कल को जब आप उस स्थल को जाएंगे तो आपके पास रोचक जानकारी उपलब्ध रहेगी। इस स्थल की खासियत ये है कि एक पहाड़ी पर ही चारोधाम बने हैं। कैसा है, क्या है सबकुछ विस्तार से जानिए इस रिपोर्ट में।

रिपोर्ट विस्तार से

नामची (सिक्किम) प्रदेश के सोलोफोक पहाड़ी पर स्थित “चारधाम” है । यहाँ भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों की एक ही जगह समेट कर पर बनायी गयी प्रतिकृति है। इसमे भारत के चारों कोनों में स्थित चार धाम एवं पूरे भारतखंड में स्थित 12 ज्योतिर्लिंग शामिल हैं। 


पहले चारधाम, छोटा चारधाम व ज्योतिर्लिंग के बारे में जानें


भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम की चर्चा चार धाम के रूप में की गई है। इन चार धामों में श्री विष्णु भगवान या उनके स्वरूप की पूजा होती है ।
इसके अतिरिक्त छोटा चारधाम या चार धाम की चर्चा भी की गई है यह भारत के उत्तराखण्ड राज्य के गढ़वाल में उत्तरकाशी,रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों में स्थित है और इस परिपथ के चार धाम इस प्रकार हैं बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमनोत्री । इनमें से बद्रीनाथ धाम, भारत के चार धामों का भी उत्तरी धाम है ।

पुराणों क्या कहता है –

हिन्दू धर्म में पुराणों के अनुसार शिवजी जिन बारह स्थानों पर स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। सौराष्ट्र प्रदेश (काठियावाड़) में श्री सोमनाथ, श्रीशैल पर श्रीमल्लिकरजुन , उज्जयनी (उज्जैन) में श्रीमहाकाल ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, ओम्कारेश्वरझारखंड में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्रीभीमशंकर,सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्रीनागेश्वर, वाराणसी (काशी) में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर,हिमालय पर केदारखंड में श्रीकेदारनाथ औरशिवालय में श्रीघृष्णेश्वर।
नामची के सिद्धेश्वर धाम के नाम से जाने वाले इस स्थल के आकर्षण का शिखर बिन्दु भगवान शिव की ऊँची-लंबी प्रतिमा है।


सोलोफोक पहाड़ी का इतिहास क्या है-

महाकाव्य महाभारत में एक ऐसा अध्याय है जहां पर अर्जुन शिव भगवान से पशुपतिअस्त्र प्राप्त करने के लिए कड़ी तपस्या करते हैं। जब शिवजी उनके समर्पित धीरज से प्रसन्न हुए, तो उन्होंने अर्जुन के समुख प्रकट होकर उन्हें पशुपतिअस्त्र का वरदान दे दिया। कहा जाता है कि यह प्रकरण नामची की सोलोफोक पहाड़ी पर घटित हुआ था। किंवदंती के अनुसार अर्जुन को पशुपतिअस्त्र का आशीर्वाद देने के लिए इस पहाड़ी पर शिव भगवान के अवतरण हुआ था ।
शिव अवतरण की खुशी में यहाँ चार धाम का निर्माण किया गया । इस परिसर का उद्घाटन नवंबर 2011 में श्री जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज और अनेकों धार्मिक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में प्राण प्रतिष्ठान के साथ हुआ।
नामची के चार धाम परिसर का केंद्रीय आकर्षण 87 फीट ऊँची शिव मूर्ति है जो पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। यहां से शिव भगवान पूरे चारधाम परिसर और उसके चारों ओर की घाटियों की निगरानी करते हैं। 
यह मूर्ति पहाड़ी के पश्चिमी छोर पर स्थित है तथा पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए है। 
यह मूर्ति 12  ज्योतिर्लिंग शिव मंदिर से घिरी है । यहां का हर एक शिवलिंग अपने मूल जगह पर स्थापित शिवलिंग की सटीक प्रतिकृति है।

चारधाम के प्रवेश द्वार

चारधाम के परिसर में प्रवेश करते ही  हाथ में  धनुष पकड़े किरतेश्वर की मूर्ति हैं। सिक्किम में यह शिव भगवान का स्थानीय अवतार के रूप में माना जाता है।
चारधाम परिसर के बीचोबीच एक फव्वारा बहता है, जहां अपने-अपने वाहन पर खड़ी गंगा और यमुना की मूर्तियां स्थित हैं। गंगा का वाहन मगरमच्छ है और यमुना का वाहन कछुआ। यह प्रयाग में गंगा और यमुना नदी के संगम की अभिव्यक्ति है।
भारत के तीर्थस्थलों में से ये चार प्रमुख मंदिर, समूहिक रूप से चारधाम के नाम से प्रसिद्ध है, जो भारत के चारों कोनों में स्थित है। 
उत्तराखंड में बद्रीनाथ, गुजरात के द्वारका में सोमनाथ, ओड़ीसा के पूरी में जगन्नाथ और तमिलनाडु में रामेश्वरम। इन प्रत्येक धामों की प्रतिकृति यहां, सिक्किम के नामची शहर में है। 
मंदिर में बाईं तरफ से घूमने की परंपरा है ताकि पूरे परिसर में परंपरागत दक्षिणावर्त तरीके से घूमा जा सके। 


पहला धाम : रामेश्वरम मंदिर

सबसे पहले रामेश्वरम मंदिर आता है जो द्रविडी मंदिरों की शैली में निर्मित है। वह अन्य मंदिरों से थोड़ा अलग भी है । यहाँ रंगबिरंगी ऊंचे गोपुरम के द्वारा मंदिर में प्रवेश किया जाता है । ऐसा माना जाता है की यह शिवलिंग की स्थापना भगवान राम ने श्रीलंका से वापसी के दौरान ब्राह्मण हत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए रामेश्वरम में स्थापित किया था  ।

दूसरा धाम – सोमनाथ मंदिर

अगला मंदिर सोमनाथ मंदिर था जो भारत के पश्चिमी तट पर द्वारका में स्थित है। यह मंदिर ठेठ गुजराती शैली में बनवाया गया है, जिसकी छत पिरामिड जैसी है।
ये मंदिर भीतर से अपेक्षाकृत साधारण हैं और मूल मंदिरों की तुलना में या आकार में भी बहुत छोटे हैं। इसके बावजूद भी ये प्रतिकृतित मंदिर मूल मंदिर के दर्शन लेने का एहसास जरूर दिलाते हैं। 
आगे जाकर यह रास्ता साई मंदिर से होकर गुजरते हुए शिव जी की मूर्ति तक ले जाता है।
साई मंदिर के बाहरी भाग में जाली काम की दिलचस्प संरचना है, जिसके चारों ओर मन्नतों के लाल धागे बंधे हैं, यह अजमेर शरीफ या चिश्ती दरगाह की याद दिलाते हैं जो फ़तेहपुर सीकरी में है।


शिव मूर्ति और 12 ज्योतिर्लिंग

सिक्किम में नामची सोलोफोक पहाड़ी पर चारधाम का दृश्य

शिवजी की मूर्ति के पास ही 12 ज्योतिर्लिंग हैं । चुकी ये सारे ज्योतिर्लिंग एक के बाद एक हैं इसलिए उनके बीच के सूक्ष्म अंतर को जाना और समझा जा सकता है ।
उदाहरण के लिए, जो शिवलिंग केदारनाथ में है वह सिर्फ पत्थर का कूबड़ है, लेकिन जो शिवलिंग रामेश्वरम में है वह दक्षिण भारत की शैली में वर्ग योनि में बनवाया गया है। वहां पर लगा हुआ एक छोटा सा सूचना पट्ट प्रत्येक शिवलिंग की कथा को दर्शाता है। एक संस्कृत श्लोक इन 12 ज्योतिर्लिंगों के भूगोल को एक छोटी सी कविता के जरिये संक्षेप में बताता है।
इसके बाद शिवजी की मूर्ति को नजदीक से दर्शन का लाभ मिलता है ।  जिस बड़े से मंच पर शिवजी विराजमान हैं उसके चारों ओर देवियों के अवतारों की खुदाई की गयी थी। शिवजी के समुख खड़े होने से व्यक्ति अचानक से स्वयं को छोटा महसूस करने लगता है और व्यक्ति सहज रूप से उनकी शक्ति के आगे झुक जाते हैं। 

इस मूर्ति के नीचे शिवमंदिर है, जहां पर शिव पुराण के अध्यायों को दर्शाया गया है। इसमें शिव भगवान के विवाह से लेकर, प्रजापति दक्ष के यज्ञ के बाद शिवजी द्वारा माता सती के मृत शरीर को लेकर घूमने से, शिवजी को पाने के लिए माता पार्वती द्वारा की गयी तपस्या तक सब कुछ समाहित है। यहां पर पुजारियों की एक टोली है जो अपने वाद्य-यंत्रों के साथ रोज मंदिर में सत्संग और कीर्तन करते हैं।


तीसरा धाम : जगन्नाथ मंदिर


अगला मंदिर जगन्नाथ पूरी का मंदिर था, जहां पर कृष्ण बलराम और सुभद्रा के साथ रहते थे। यहां की मूर्तियाँ भी अपने मूल स्थान के मूर्तियों की प्रभावशाली प्रतिकृति है।


चौथाधाम : श्री बद्रीनाथ धाम


जो सबसे अच्छा है उसे अंतिम दर्शन के लिए संरक्षित रखा गया था, अर्थात रंगबिरंगा बद्रीनाथ मंदिर। चारधाम या सिद्धेश्वर धाम, जैसा कि उसे आधिकारिक तौर पर कहा जाता है, की यात्रा करना सम्पूर्ण भारत की यात्रा करने जैसा है। ये तीर्थस्थल पूरे भारत को एक ऐसे बंधन में बांधते हैं कि, जहाँ राजनीतिक सीमाओं का उनके लिए कोई मतलब नहीं रहता। श्रद्धा और विश्वास का यह  भारत की सीमाओं को परिभाषित करता है।