कैदी मुर्तुजा…और जेल डीआईजी… की दिल छू लेने वाली स्टोरी !

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नीरज झा, जेल डीआईजी, बिहार की फाइल फोटो।

कटिहार जेल के विचाराधीन कैदी की कहानी

गेस्ट कॉलम –

जेल डीआईजी नीरज झा की कलम से –

उसने आंखों से मुझे कराह के साथ देखा। मैंने उसके सिर पर हाथ फेर कर उसे बोला मैं हूं.. फिर डॉक्टर से मेरी बात हुई.. डॉक्टर ने बताया कि अब ठीक हो जाएगा.. फिर भी उसे अच्छे ईलाज के लिए भागलपुर रेफर किया गया.. कुछ दिनों के बाद स्वस्थ मुर्तुजा मेरे सामने खड़ा था.. ये वर्ष २०११ की घटना है।

कटिहार जेल, बिहार।

एक विचाराधीन बंदी प्रात: सात बजे जेल में अफरातफरी का माहौल … कटिहार मंडल कारा की घटना… मुर्तुजा के खून से सने होने की सूचना मुझे आवास पर मिली। मैं तुरंत कारा गेट की तरफ जल्दी से निकला.. मुर्तुजा कारा गेट में स्ट्रेचर पर लेटा हुआ… सदर अस्पताल जाने के लिए.. खून से लथपथ.. मैंने जानकारी ली कि क्या एवं कैसे हुआ.. पता चला कि पाइल्स का प्रॉब्लम था.. आज टॉयलेट में अचानक इसने पाइल्स के कारण उसे ब्लेड से काट डाला.. फिर खून की नदी बह रहा है.. जेल के डॉक्टर ने प्रारंभिक ट्रीटमेंट के बाद सदर अस्पताल भेजने का निर्णय लिया.. उसे बिना बिलंब के अस्पताल भेजा गया.. जहां डॉक्टर ने देखते ही उसे कटिहार मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया.. ब्लड लगातार बह रहा था.. मुर्तुजा बेहोश.. कोमा में।

जल्दी से मेडिकल कॉलेज में एडमिशन करा के ट्रीटमेंट शुरू किया गया.. मैं जेल ऑफिस से लगातार उसके स्थिति की जानकारी ले रहा था.. मेडिकल कॉलेज में ट्रीटमेंट के क्रम में डॉक्टर ने ब्लड लाने को कहा.. तत्काल ब्लड बैंक से ब्लड मिलना मुश्किल… गार्ड ने सूचना दिया.. जेलर हॉस्पिटल में ने भी ब्लड नहीं मिलने की सूचना दिया.. मैंने तत्क्षण उसे खुद के हॉस्पिटल आने की बात कही.. मेरा ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव होने के कारण मैंने खुद का ब्लड देने का निर्णय लेके अस्पताल के लिए चल दिया.. जेलर ब्लड नहीं मिलने से परेशान हो चला था और मुर्तुजा deep कोमा में..   मैंने जेलर को बताया कि मैं ब्लड देने आ रहा हूं.. इस बात को सुनकर आश्चर्यचकित हो गए.. बोले सर आप कैसे??? मैंने कहा हां ब्लड मैं दूंगा।

रक्तदान की प्रतीकात्मक तस्वीर ! FILE PHOTO ।

अनुभवी जेलर तब तक खुद को भी ब्लड देने के लिए तैयार कर लिए थे.. मेरे अस्पताल आने तक जेलर हल्के मन से ही ब्लड दे रहे थे.. मैंने अस्पताल पहुंचकर मुर्तुजा को देखा जो लगातार जीवन से जूझ रहा था.. जेलर का ब्लड चढ़ना शुरू हो गया मुर्तुजा को.. फिर मैंने भी एक यूनिट ब्लड दिया.. जिसे मुर्तुजा को चढ़ाया गया… कुछ देर के बाद धीरे धीरे उसके पलक और होंठ हिलने लगे.. मैं रुका रहा उसके होश मेंआने तक.. तीन घंटे के बाद मुर्तुजा आंखो में आंसुओ के साथ होश में आ गया था।

उसने आंखों से मुझे कराह के साथ देखा। मैंने उसके सिर पर हाथ फेर कर उसे बोला मैं हूं.. फिर डॉक्टर से मेरी बात हुई.. डॉक्टर ने बताया कि अब ठीक हो जाएगा.. फिर भी उसे अच्छे ईलाज के लिए भागलपुर रेफर किया गया.. कुछ दिनों के बाद स्वस्थ मुर्तुजा मेरे सामने खड़ा था.. ये वर्ष २०११ की घटना है।


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आपने लिखा :- नीरज झा जेल डीआईजी, बिहार !

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