भाई-बहन का एक अनूठा मंदिर

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बिहार के सिवान में भारतीय संस्कृति की मिशाल

बड़गद पेड़ है साक्षी, पूजे जाते हैं भाई-बहन

गौतम बुद्ध ने भी यहां की थी उपासना

भीखाबांध का ये स्थल अब अतिक्रमण का शिकार

इसकी रक्षा की उठती रही है मांग

मौर्य न्यूज18 के लिए राजेश कुमार

सिवान, बिहार । मौर्य न्यूज18  

भारतीय सभ्यता औऱ संस्कृति में प्रकृति प्रदत्त हर चीज की पूजा का प्रावधान है। चाहे वो, वृक्ष हो, पशु-पक्षी हो, कीट हो, सांप हो हर चीज किसी ना किसी रूप में पूज्यनीय है। उसी तरह से मानवीय रिश्ते भी पूज्यनीय हैं। और उसकी पूजा होती रही है। इसी संस्कृति के कारण भारत दुनिया का सबसे अनूठे देश के रूप में जाना जाता है। रक्षा बंधन पर भाई को बहन रक्षा सूत्र बांधती हैं। और इस दिन भाई-बहन का बड़ा महत्व होता है। बिहार के सिवान जिले में एक अनूठा मंदिर भी है जो भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है और भाई-बहन की पूजा भई की जाती है। तो जानते है इस मंदिर के बारे में विस्तार से। वर्तमान से इतिहास तक। इससे सिवान से हमारे संवाददाता राजेश कुमार ने पेश की है। जानिए आप भी ।

भारतीय संस्कृति में अनूठा स्थल

भारतीय संस्कृति में भईया-बहिनी का प्रसिद्ध मन्दिर का विशेष महत्व हैं। यह भारतीय संस्कृति धरोहर अनेकता में एकता का संदेश प्रदान करता हैं। विश्व की संस्कृतियों को भी यह खुला निमन्त्रण देता हैं। वही भारत की माटी कुछ ऐसी हैं जिसके कण-कण में धार्मिक आस्था की गहरी पैठ समायी हैं। चाहे भारतवंशि हो या किसी अन्य देश का कोई इससे अछुता नहीं हैं। भारत के इस महत्वपूर्ण धार्मिक एवं ख्याति प्राप्त इस भईया-बहिनी का प्रसिद्धि  मन्दिर देखने की चाह में आने वाले देशी व विदेशी श्रद्धालू  खिचे बरबस चले आते हैं।

कहां पर है मंदिर

बिहार के सिवान जिले में है भीखाबांध का भाईया-बहिनी मंदिर

भारत का प्रसिद्ध  यह मन्दिर जितना समृद्ध  धार्मिक व आर्थिक पक्ष हैं उतना मजबूत इतिहास। यह शतिवरता की पहचान हैं सारण मण्डल के सिवान जिले के भिखाबान्ध का भईया-बहिनी का प्रसिद्ध मन्दिर। महाराजगंज  अनुमंडल के अन्तर्गत  भिखाबान्ध एक गाँव है। यह महाराजगंज से 3 किमी की दूरी पर उपरोक्त गाँव में ही सिवान-पैगंबरपुर सड़क में भईया-बहिनी का मन्दिर अवस्थित हैं, मन्दिर की चारो तरफ 12 बीगहा में फैला सैकडों जटानुमा खड़ा  वट वृक्ष ऐतिहासिक  दृश्य प्रदर्शित कर रहा हैं।

क्या है इतिहास    

14 वीं सदी में मुगल साम्राज्य का शासक जाहिरुद्दीं मुहम्मद बाबर था। बाबर ने भारत पर 5 बार आक्रमण किया था और  पांच बार सफल भी रहा। पहली लड़ाई 1519 में युसुफ जाई के विरुद्ध  लड़ी थी,वहीं दूसरी लड़ाई 21 अप्रैल 1526 में इब्राहिम लोदी के खिलाफ,तीसरी बार खान्नवा का युद्ध  17 मार्च 1527 को राणा साँगा के विरुद्ध,चौथी बार चनबेरी  का युद्घ 29 जनवरी 1528 ई  में मेदरि  राय से किया। पांचवी बार घाघरा का युद्घ  6 मई  1529 में अफगानो के खिलाफ लडा। मुगलों द्वारा बार-बार भारतीय शासकों से जीत के उनका कारण मनोबल बडा  हुवा था। जिसके कारण मुगलो ने भारत की संस्कृति पर आतंक का साया फैला रखा था। खनवा का युद्घ  1527 में जब बाबर राणा- संगा से लड़ रहा था, उस समय मुगल सिपाहियों की क्रूरता के कारण माँ-बहनें ने भी अपने को असुरक्षित महसूस कर  रही थी। चरों तरफ आतंक का साया था। 

कौन थे भईया-बहिनी?  

   छपरा जिले के एकमा थाना क्षेत्र के भलुआ गाँव के सगे  भाई-बहन थे। भाई अपनी बहन को ससुराल से अपने घर एकमा के भलुआ गाँव ले ज रहा था। उस समय भिखाबांध गाँव के समीप सड़क के किनारे जंगल झाडी थे। लोगों की माने तो उस समय मुगल सेनाओं का आतंक चरम पर था। मुगल सेना  को देख कर भाई-बहन झाड़ी में छिप गये थे। मगर मुगल सेना जे सिपाही दोनों को देख लिया था। दोनों को पकड़ने के लिए जंगल को घेर लिया व तलासी करनी शुरु कट दिन। बहन ने अपने को असुरक्षीत समझ कर सीता के समान घरती से प्रार्थना की कि मुझे शरण दो और  घरती फट गई। भाई-बहन दोनों धरती में समा गये। साथ ही हाथी-घोड़े पर सवार मुगल सिपाहियों का भी पतन उसी स्थल पर दैविक प्रकोप से हो गया। भाई – बहन का अटूट प्रेम एवं विश्वास का प्रतीक हैं ऐतिहासिक भैया बहिनी मंदिर भीखाबांध ।

एतिहासिक महत्व

दारौदा मुख्यालय से 12 किलोमीटर तथा महाराजगंज अनुमंडल से चार किलोमीटर की दूरी पर सिवान -पैगम्बरपुर पथ के किनारे स्थित भैया बहिनी मंदिर मंदिर । इस मंदिर की ऐतिहासिक महत्व के बारे मे बताया जाता है कि मुगल शासक काल में एक भाई अपने बहन को डोली से राखी बांधने के लिए दो दिन पूर्व लेकर भभुआ से आ रहे थे । आने के क्रम में दारौदा के भीखाबांध गांव के समीप सिपाही गश्त कर रहे थे ।    

बहन की सुंदरता के दुश्मन मुगल  

बहन की सुन्दरता देखकर उनके मन में दुव्यर्वहार की भावना भर गई । सिपाहियों ने डोली को रोक कर दुव्यर्वहार करने का प्रयास करने लगे । इस पर भाई ने अपनी बहन की रक्षा के लिए सिपाहियों से उलझ गए । बहन अपने आप को असहाय महसूस करते हुए भगवान को याद किया । उसी समय घरती फटी और भाई बहन दोनों उसी में समा गए । डोली उठा रहे कुम्हारों ने वही कुएँ मे कुद कर जान दे दी थी । कुछ दिनों बाद यहाँ एक ही स्थल पर दो बट वृक्ष हुआ । जो कई बीघा जमीन पर फैल गया ।  वृक्ष ऐसे दिखाई देते हैं लगता है कि एक दूसरे के सुरक्षा कर रहे हो ।  

भाई-बहन के पिंड की होती है पूजा

उसके बाद इस बट वृक्ष की पूजा से सबकी मनोकामनाएं पूरी होती गई । इसके बाद यहां एक मंदिर का निर्माण हुआ । जिसमें भाई बहन के पिंड को पूजा होती हैं । भाई बहन सोनार जाति के होने के चलते सबसे पहले इन्हें जाति के लोगों द्वारा पूजा अर्चना की जाती हैं । सोमवार को काफी संख्या में श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना कर आशिर्वाद लिया । प्रत्येक वर्ष रक्षा बंधन के दो दिन पहले पूजा अर्चना होती हैं । 10 एवं 11 सितंबर को हर साल की भांति इस बार भी मेला लगेगा । ग्रामीणों ने बताया कि यहाँ अतिक्रमण के चलते बट वृक्ष कुछ कठ्ठा में सिमट गई है । प्रशासन से इस मंदिर एवं वटवृक्ष का ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की मांग की ।   स्थल बना पूजनीय  भईया-बहिनी के मृत स्थल पर वादगार  के लिए लोगों द्वारा छोटा सा मन्दिर का निमार्ण 15 वीं सदी में कराया गया। जहां लोग सालों भर पूजा पाठ  करते हैं। मन्नतें माँगनेवाले कि मन्नतें भी पूरी होती हैं। मन्दिर के इर्द गिर्द 12 बिगहा में वट वृक्ष सैकडों  की  संख्या में फैले हुए हैं। जो एक दूसरे से संयुक्त रुप से हैं।

              क्या है धारणा   

लोगों का मनाना हैं की पूर्वज  पूर्व से ही  उक्त स्थल पर  भईया-बहिनी का पूजा पाठ करते आ रहे हैं। बहन सत्ती थी, भाई सच्चा था, जो मरणोपरांत  दुर्गा व ब्रह्मा  के रुप में आज भी विराजमान हैं। जहां श्रद्धा  से पूजा-पाठ  करने वालो की मन्नतें पूरी होती हैं।  यहाँ देश-विदेश व प्रदेशों से भी लोग वर्तमान दृश्य को देखने व पूजा-पाठ के दौरान मन्नतें माँगने आते हैं। आस-पड़ोस के लोग यह भी कहते है की वट वृक्ष फैलता  फैलता निजी जमीन में चला गया हैं। कोई एक टहनी भी नहीं काट सकता, काटने पर उसके साथ कोई-न-कोई घटना घट जाटी  हैं। आज भी रक्षा बंधन  के दिन वट वृक्ष में रक्षा का सूत्र  बहनों द्वारा बंधा जाता हैं।         

कुष्ठ रोग से मिलती है मुक्ति

जनवरी 1780 में महाराजगंज  शहर के किशोरी साह स्वर्ण व्यवसायी सफेद चर्म रोग से ग्रसित थे। भईया बहिनी के पास किसी गडढे में पानी लगा था। शौच  के दौरान जब वे उस गड्ढ़े के पास गये और  ज्योही पानी में हाथ डाला  उनका रोग ठीक हो गया। इसके बाद ही साहू ने उस पानी से पुरे शरीर को धो डाला  और  उनका संपूर्ण  शरीर बिल्कुल ठीक हो गया। उसके बाद उन्होनें मन्दिर का निमार्ण कराया गया। तब से महाराजगंज  के स्वर्ण जाती के लोग के सावन की अष्टमी के दिन भईया बहिनी के स्थान पर धूम-धाम से पूजा करते आ रहे हैं।                

क्या है विचारणीय

वर्तमान मौजुद सैकडों वट वृक्ष में कौन सा वट वृक्ष पुरानी जड़  हैं वह बताना अस्ज भी मुश्किल बना हुवा हैं। मौजुद सभी पेड़ो  में जटा धरती पर लटक कर एक दूसरे  पेड़  से लगे हुई हैं जिसके  कारण असली जड़  को पहचाना मुश्किल हैं।  

  संरक्षण की उठ रही माँग  

बिहार के प्रसिद्धि और पवित्र भईया-बहिनी के मन्दिर और वट बृक्ष के मुगलकालीन इतिहास को देखते हुये सरकार और जनप्रतिनिधियों से कई  बार संरक्षण की माँग उठ चुकी है। फिर भी ढाक-के-तीन पात वाली बात हो चुकी हैं। इसके इतिहास को देखते हुये अगर पुरात्व विभाग इसे पर्यटक के रुप में विकास करे तो आमदनी के साथ विकास की नई गाथा लिख जाएगी। जिससे स्थानिये लोगो को भी रोजगार के अवसर प्राप्त होगें। सरकार को इस इतिहासिक जगह पर ध्यान देना चाहिये।

सिवान से मौर्य न्यूज18 के लिए राजेश कुमार की रिपोर्ट