कैमरे में महाकाव्य ! औऱ विश्व फोटोग्राफी दिवस । Maurya News18

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फोटोग्राफी की कला अब एक लंबी यात्रा कर चुकी

डॉ ध्रुव गुप्त की कलम से

चेहरों और वस्तुओं की आकृति कागज पर दर्ज़ करने से शुरू फोटोग्राफी की कला अब एक लंबी यात्रा तय कर चुकी है। अब यह चेहरों, प्रकृति और जीवन के यादगार लम्हों को सहेजने का साधन भर नहीं, एक बेहद जीवंत और प्रभावशाली कला है। पिछले कुछ दशकों में यह आकृतियों, दृश्यों और पलों के भीतर की संवेदनाओं और विडंबनाओं को पकड़ने और अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम बन चुका है। तस्वीरें अब दिखाती भर नहीं, संवाद करती हैं। एक तस्वीर इतना कुछ कह और प्रकट कर सकती है जो एक महाकाव्य और उपन्यास के विस्तार में भी कहना संभव नहीं है। अगर छायाकार के पास संवेदना और अंतर्दृष्टि है तो कविताएं और कहानियां हर तरफ बिखरी हुई हैं। वह कैमरे के एक छोटे से क्लिक में भी चाहे तो भावनाओं का अनंत संसार रच सकता है। किसी ने सच कहा है कि साहित्य शब्दों में ही नहीं, छवियों में भी रचा जा सकता है। फोटो खींचकर उसे कागज़ पर प्रिंट करने की तकनीक विकसित होने के बाद आज से 175 वर्षों पहले 19 अगस्त को पहली बार आम लोगों को फोटो खींचने का अधिकार मिला था। तब से दुनिया भर के फोटोग्राफर इस दिन को ‘विश्व फोटोग्राफी दिवस’ के रूप में मनाते हैं।

सभी फोटोग्राफर और इस कला के प्रशंसक मित्रों को विश्व फोटोग्राफी दिवस की बहुत बहुत बधाई, चर्चित छायाकार अबीर चौधरी,कोलकाता की एक जीवंत तस्वीर के साथ।

गेस्ट परिचय – आभार !

आपने लिखा है

डॉ ध्रुव गुप्त

आप बिहार से है । आप आईपीएस हैं। आपने देश में बतौर पुलिस अधिकारी सेवा दी है। औऱ अब साहित्य की दिशा में अपना योगदान दे रहे हैं। आपकी रचना देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओे में प्रकाशित होती रही है।

मौर्य न्यूज18 के लिए गेस्ट रिपोर्ट