लॉ एंड ऑर्डर के बारे बता रहीं है एडवोकेट तृप्ति ! Maurya News18

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विषय है,देश में बढ़ते जुर्म और घरेलू हिंसा के बारे में।



मौर्य न्यूज 18 कि एक्सक्लूसिव बातचीत में हमारी आज कि मेहमान है दिल्ली एनसीआर में कार्यरत एडवोकेट तृप्ति सिंह ,आइए हम इनसे जानते है हमारी कानून व्यवस्था के बारे में

हमारे देश में जिस तरह से कानून व्यवस्था लचर हो चुकी है वो बहुत ही दुखद है,लोगो के मन में बहुत सारे प्रश्न है । अब भी हर तरफ लूट पाट, मर्डर ,घरेलू हिंसा ,किडनैपिंग , लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार के मामले बढ़ते जा रहे है । जिसकी सबसे बड़ी वजह है शिक्षा की कमी ,रोजगार ना मिलना ,भुखमरी ,गलत मार्गदर्शन इत्यादि। हमारे देश में जिस तरह से पेंडिग केस बढ़ते जा रहे है ,और न्याय मिलने में काफी वक्त जा रहा है ,जिस वजह से लोगो का विश्वास कानून व्यवस्था से उठता जा रहा है,हमारे देश में लंबित मामलों की कुल संख्या 2.9 करोड़ तक पहुंच चुकी है,जिसमें से 71% सिर्फ क्रिम्नल केस है,यहां तक 60 लाख ऐसे केस है जिन्हे चलते हुए 5 साल से भी अधिक का समय बीत चुका है ,कुल पेंडिग केस का 96% हिस्सा 6 राज्यो का है इसमें यूपी,महाराष्ट्र ,पश्चिम बंगाल,बिहार,गुजरात और उड़ीसा हैं।

इन सभी राज्यो में यूपी पहले नंबर पे है जहां अब भी क्राइम के सबसे ज्यादा मामले आते हैं,वहीं महाराष्ट्र दूसरे नंबर पे आता है जुर्म के बढ़ते तादाद में।हम आपको एक और बात बताना चाहेंगे कि हम सभी देवी की पूजा करते है या हमारी जन्म देने वाली मां हो लेकिन हम अपने ही घर या बाहर में उन देवियों का अपमान करते है जो शायद हमारी मां या बहन नहीं है , आंकड़े ये बताते है कि भारत में हर तीसरी महिला घरेलू हिंसा कि शिकार है फिर वो चाहे मानसिक रूप से हो या शारीरिक रूप से,वाबजूद इसके वो कोई शिकायत नहीं करती ,डरती है परिवार से ,समाज से या सगे संबंधियों से हम उन महिलाओं के मार्गदर्शन के लिए आज इस मुद्दे पे चर्चा करेंगे हमारे खास मेहमान से ,उम्मीद है आपको बहुत ही प्रेरणा मिलेगी इस बातचीत से तो आइए जानते है हमारे कुछ प्रश्न के बारे में।

फ़ाइल फोटो एडवोकेट तृप्ति सिंह मौर्य न्यूज 18

वतर्मान समय में जिस तरह से क्राइम बढ़ रहा है,ऐसे में जनता का विश्वास सुदृढ़ कैसे करे कि वो कानून व्यवस्था पर अपना भरोसा रखे?

इस पर उन्होंने कहां की हमारे समाज में दो तरह के लोग होते है

1. वैसे लोग जो समाज में सुव्यवस्था और उसके नियमो का पालन करने वाले होते है जिनकी कोशिश होती है कि आस पास कोई भी गलत एक्टिविटी ना हो जिससे की अराजकता फैले

2.दूसरे वैसे भी लोग होते है जो अपराधिक प्रवृति के होते है,लेकिन उनका कहना था कि मै ये नहीं कहूंगी कि कोई भी इंसान जन्म से ही अपराधी पैदा होता है,उन्हें वो माहौल मिलता है जिससे कि वो अपराधी बन जाते है,और ये हम नहीं पौराणिक कथाओं में भी देखा गया है जैसे देव और असुर इन सभी के सोचने का नजरिया अलग अलग है।और कानून भी इसलिए ही बनाया गया है कि जो लोग भटक चुके है या जुर्म को अपना चुके है उन्हें सजा दी जाय जिससे कि उन्हें अपनी गलती का एहसास हो और वो सुधर जाय ,तो ये सब तभी होगा जब हम न्यायालय पे भरोसा रखेंगे ।आज देश की जनसंख्या इतनी अधिक है उस मुकाबले जज और पुलिस वाले काफी कम है तो थोड़ा टाइम तो लगता है जांच पड़ताल और उसके नतीजे आने में तो जनता को धीरज रखना होगा।

.आंकड़ों के अनुसार भारत में हर तीसरी महिला घरेलू हिंसा से पीड़ित है बावजूद इसके वो अपने लिए आवाज़ नहीं उठाती ऐसा क्यूं?

इस प्रश्न पर उन्होंने बताया कि महिलाओं को सबसे पहले ये जानना चाहिए कि उनके हित में जो कानून बनाए गए है ,वो उसे जाने और जागरूक रहे ।यहां सबसे बड़ी कमी ये है कि महिलाएं अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को दबा देती है,उन्हें डर सताता है समाज ,आस पड़ोस और परिवार का।उन्हें लगता है कि अगर वो अपने बचाव में कुछ करेंगी तो लोग क्या कहेंगे ,वो कहां जाएंगी ,क्या करेगी उनकी मदद कौन करेगा ,यहीं वजह है जिससे वो हर दिन मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलती है क्योंकि उन्हें हमेशा से संस्कार और संस्कृति का हवाला दिया जाता है ।उन्हें बताया जाता है कि आप नारी है आपको सहना पड़ेगा ,भले ही आपको सम्मान ना मिले लेकिन दूसरों को सम्मान देना होगा तो यहां सोच बदलनी होगी ,अपने विचार को को बदलना होगा ।हर लड़की पढ़े और आत्मनिर्भर बनें अपने लिए आवाज़ उठाने की हिम्मत करे तभी सब कुछ बदलेगा तभी तो कहते है बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।जितना अधिक जागरूकता फैलाई जाएगी उतना अधिक प्रभाव होगा।

हमने आगे उनसे जाना कि कोर्ट में पेंडिग केसेस बढ़ते जा रहे है, इसके बावजूद जब कोई भी विवाद होता है तो लोग कहते है कि आईं विल सी यू इन द कोर्ट लेकिन उन्हें तो पता ही नहीं है कि उन्हें न्याय मिलने में ना जाने कितने दिन लग सकते है ऐसा क्यूं है?

मिस तृप्ति ने बताया कि यहां जो शब्द है वो बहुत ही अच्छा है कि लोग आपस में सुलह ना होने पे कोर्ट का सहारा लेना चाहते है और विवाद ज्यादा नहीं बढ़ता और ये जागरूकता है जो कि बहुत अच्छी चीज है नहीं तो हमने जहां तक देखा है कि छोटी छोटी विवादों पर बहुत बड़ी बड़ी जुर्म हो जाती है जैसे किडनैपिंग ,मर्डर , मार पीट वगैरह और जहां तक सवाल है पेंडिग केसेस का तो हमारी देश कि जो जनसंख्या है उस मुकाबले न्यायालय में जज और कर्मचारियों की कमी है।उनका कहना था कि कितनी बार उन्होंने भी इस परेशानी को फेस किया है कि कभी कभी किसी भी केस में ऑर्डर पास हो जाता है तो जजेस के पास ऑर्डर लिखने वाले नहीं होते तो कहीं ना कहीं ये सारी कमियों के वजह से दिक्कतें आती है,इसका समाधान तो बस यही है कि और न्यायपालिकाओं का निर्माण हो ,स्टाफ बढ़े ,जजों की नियुक्ति हो तो फटाफट केस ख़त्म होने लगेंगे।जितनी जनसंख्या है उसके अकॉर्डिंग कोर्ट कम है आज के समय में हर जगह डिस्प्यूट होता है ।इसमें जहां तक हो सके छोटे मोटे मैटर्स बाहर ही बाहर सॉल्व होनी चाहिए और जो गंभीर समस्या है उसकी बहस कोर्ट में जाय तभी समस्या कम होंगी।

आज के जो हालात है ना कोर्ट, ना सुनवाई सीधा एनकाउंटर तो क्या ये सही है या गलत?

इस प्रश्न पर उन्होने कहां कि ऐसा नहीं है ,हर एनकाउंटर के पीछे की वजह जानना सबसे ज्यादा जरूरी है अगर मुजरिम भागने की कोशिश करता है और पुलिस के जान पे बन जाती है तो हमारे कानून में आम जनता को भी सेल्फ डिफेंस में अपनी जान बचाने के लिए कुछ भी करना का राइड है तो अगर पुलिस अपनी जान बचाने के लिए मुजरिम को मारता है तो ये गलत नहीं है क्यूंकि अगर वो ऐसा नहीं करेगा तो उसकी जान जा सकती है ।लेकिन कोई भी एनकाउंटर ही उसकी पूरी जांच होती है अगर जांच में पुलिस दोषी पाया जाता है और लगता है कि एनकाउंटर फेक है तो इसकी सजा भी उन्हें मिलती है।और ऐसे केसेस बहुत कम है जिसमें फेक एनकाउंटर होता है ।वरना हर मुजरिम की पेशी होती है उन्हें सजा मिलती है और बहुत सारे ऐसे भी गुनहगार है जिन्होंने संगीन आरोप किए है और वो पे रोल और जमानत करवा के छूट जाते है और खुला घूमते है तो उनसे कितना खतरा है समाज को ये हम सभी जानते है लेकिन जब तक कोर्ट में कोई दोषी सवित नहीं होता उसे हम मुजरिम नहीं कह सकते क्यूंकि कोर्ट गवाह और सबूत को है मानती है।

जो महिला हर दिन दहेज के नाम पर या किसी भी अन्य वजह से शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेल रही है,वो अपना बचाव कैसे करे ?

इस प्रश्न पर उनका कहना था कि अगर आप चाहती है कि आपका घर भी ना टूटे और सब कुछ सही हो जाए तो आपको कोर्ट के मध्यस्थता केंद्र में जाना चाहिए जहां आपके और आपके घरवालों को आमने सामने बैठकर समस्या का समाधान किया जाता है और ये सुविधा हर कोर्ट में होती है ,और मध्यस्थता केंद्र में बहुत ही वेल एक्सपीरिएंस वकील होते है जो इन सारे मैटर्स को सॉल्व करते है, वहां लिखित में सब कुछ होता है सारे प्रोसीजर्स अच्छे से होती है और सारे नियम को फॉले करते हुए दोनों पक्षों में सुलह करवाई जाती है क्यूंकि अगर कोई डिवोर्स के भी मामले होते है तो सबसे पहले शादी को बचाने कि कोशिश की जाती है ना कि तोड़ने की ।
कोर्ट भी यही चाहती है कि पहले सुलह कराई जाय, अगर इसके विपरित आपको और भी कोई परेशानी झेलनी पड़ रही है जो आप बर्दास्त नहीं कर पा रहे है जैसे कि उन्हें आर्थिक परेशानी ,शारीरिक या मानसिक परेशानी हो रही है जो की अब सहा नहीं जा रहा है तो उस सूरत में महिलाओं के लिए डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट के तहत उन्हें काफी रिलीफ मिलता है और इस एक्ट के तहत उन्हें उनका खर्चा मिलता है ,जिसमें मेडिकल हो या रहने या खाने के खर्चे वो सभी सुविधा उन्हें मुहैया करवाई जाती है उनके ससुराल वालो से और इससे भी बात ना बने तो वो सी ए डब्लयू सेल में कंप्लेन कर सकती है।

हमारा आखिरी प्रश्न है कि अब भी लोग कोर्ट कचहरी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते है क्यूंकि उन्हें लगता है कि जब तक न्याय मिलेगा हमारी जेब खाली हो चुकी होगी?

मिस तृप्ति का इस कहना था कि कोई भी काम अगर हम करते है तो उसकी एक वाजिब मेहनताना हमे मिलता है वैसे ही अगर हम किसी भी क्लाइंट का केस लेते है तो उसको न्याय दिलवाने के लिए हर संभव प्रयास करते है जैसे कि उनकी केस कि स्टडी करना,केस की डिटेल्स निकालना , नोटिस भेजना ,वो हर छोटी से छोटी चीज जो उस केस को मजबूत कर सके और इन सब चीजों को इकठ्ठा करने में हमारा मेहनत और समय दोनों जाता है तो हम अपना मेहनताना कैसे छोड़ सकते है ।लेकिन अगर कोई मजबूर और जरूरतमंद व्यक्ति हमारे पास आते हैं जिनको न्याय पाने के लिए पैसे नहीं होते तो हम उनकी मदद जरूर करते है ।आखिर हम सभी अपनी आजीविका चलाने के लिए ही तो इतना मेहनत करते है फिर वो किसी भी प्रोफेशन के हो।

नई दिल्ली से बबली सिंह की रिपोर्ट ।