मोदी युग में पूरा हुआ एक औऱ अटल सपना..! Maurya News18

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नेपाल बार्डर के सामानांतर दौड़ेगी भारतीय ट्रेन

17 साल लग गये महासेतू के बनने में

2003 में बजट 323.41 करोड़ रुपये था

17 वर्षों में लागत 516.02 करोड़ रुपये

16 को अटलबिहारी की पुण्यतिथि पर हो सकता उद्धाटन

पटना/सुपौल, मौर्य न्यूज18 डेस्क।

बिहार को विधानसभा चुनाव से पहले केन्द्र की ओर से एक और सौगात मिलना है। वजह, मोदी युग में अटल का सपना पूरा जो हुआ है। हम बात कोसी नदी पर बने रेलवे महासेतू की कर रहे हैं।

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पूरी दुनिया को पता है नेपाल अब भारत के खिलाफ खूब बोल रहा है। नेपाल बार्डर पर विवाद के बीच एक नई खबर जो इंडिया से है। भारत में खुशियां देने वाली है वो है- नेपाल बार्डर के सामानंतर ट्रेन का चलना। ये संभव हुआ है कोसी नदी पर दो किलो मीटर लंबे रेलवे मेगा ब्रिज के तैयार हो जाने से । इसके बनने में 17 साल लग गए। 2003 में इसका निर्माण शुरू हुआ था। अब तो इस पर ट्रायल के तौर पर डबल इंजन भी सफलता पूर्वक दौड़ चुकी है। इससे कोसी औऱ मिथिलांचल के बीच का महासेतु कहा जा रहा है, जो कोसी नदी के बाढ़ से त्रस्त लोगों के लिए बहुत बड़ी लाइफ लाइन होगी। औऱ बड़ी आबादी जुड़कर इलाके का विकास कर सकेगी ।उम्मीद है कि 16 अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर इसका उदघाटन हो । क्योंकि अटलजी ने ही इस महासेतु की नींव रखी थी। अब ये भी संयोग ही कहिए कि अटल का सपना मोदी युग में पूरा हो रहा है। जिसमें एक ये कोसी रेल महासेतू भी है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हरी झंडी मिलते ही इसकी खबर भी सामने आ ही जाएगी।

एक सदी पहले भी चलती थी यहां ट्रेन

बता दें कि यह पुल निर्मली-सरायगढ़ ब्रॉडगेज लाइन का हिस्सा है, जिसे मूल रूप से 1970 के दशक में 1887 में निर्मित एक पुरानी मीटर-गेज लाइन को बदलने के लिए स्वीकृत किया गया था. उस समय, कोसी नदी इन दो स्टेशनों के बीच नहीं बहती थी और एक छोटा पुल सुपौल जिले में निर्मली के पास सहायक नदी तिलजुगा के पार बनाया गया था.

बाढ़-भूकंप से रेल ब्रिज हुआ था क्षतिग्रस्त

कालांतर में कोसी के निरंतर पश्चिम की ओर शिफ्टिंग की वजह से आने वाली बाढ़ और 1934 में भारत-नेपाल में आए भूकंप के कारण यह रेल लिंक क्षतिग्रस्त हो गया था. इसके बाद कोसी नदी की प्रकृति के कारण इस लिंक को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया, लेकिन वाजपेयी ने जो सपना 17 वर्ष पूर्व देखा था वह अब पूरा होने वाला है ।

इसके रणनीतिक महत्व भी हैं….

इस महासेतु का बड़ा महत्व है। एक तो मिथिलांचल और कोसी इलाका जुड़ेगा। इसके अलावा भारत का बेहद रणनीतिक महत्व भी जुड़ा है। गौर करें तो, ये उत्तर भारत को पूर्वोत्तर से जोड़ने का सबसे छोटा रास्ता होगा । ये पूरा इलाका नेपाल की सीमा से जुड़ा हुआ है। उस दृष्टि से देखें तो नेपाल की सीमा वाले इलाके में जहां भारत में रहने वाले विकास को मोहताज थे, वो तेजी से विकास करेंगे। औऱ नेपाल इस सारी चीजों को देखेगा। वहां के लोग भी जुड़ने की चेष्टा करेंगे। उनके लिए भी कोसी इलाके में जाना-आना बहुत आसान हो जाएगा। कल को नेपाल से कोई मसला उलझता भी है तो वहां तक आसानी से पहुंचने का ये बेहतरीन रास्ता होगा। समय की भी बचत होगी।

पूर्वोत्तर राज्यों में पहुंचने का वैकल्पिक रास्ता

बता दें कि पुल का शिलान्यास वाजपेयी ने 2003 में पूर्वोत्तर सीमा रेलवे को रणनीतिक संपर्क प्रदान करने के सरकार के फैसले के तहत किया था. योजना के अनुसार, इस रूट में रेल परिचालन से पूर्वोत्तर तक पहुंचना बेहद आसान हो जाएगा और एक वैकल्पिक मार्ग के माध्यम से लोगों के आवागमन और माल ढुलाई का एक वैकल्पिक रास्ता भी होगा.

खास बात ये भी है…

सबसे खास बात ये है कि कोसी पर बन रहा यह महासेतु भारत और नेपाल के बीच करीब 1700 किमी से अधिक की विस्तारित सीमा पर करीब-करीब चारों ओर एक वैकल्पिक मार्ग बनता है. बता दें कि अभी पूर्वोत्तर, जिसके प्रवेश द्वार को हम ‘चिकन नेक’ के नाम से भी जानते हैं, से आने वाली ट्रेनों को कटिहार और मालदा होकर आना पड़ता है. लेकिन, इस रूट पर ट्रेनों के परिचालन शुरू होने के साथ ही पूर्वोत्तर पहुंचना आसान हो जाएगा. इस रेल महासेतु के कारण दरभंगा, निर्मली और अंत में न्यू जलपाईगुड़ी के रास्ते असम का नया रास्ता खुल जाएगा और वहां आना-जाना सुगम हो जाएगा.

इस महासेतु के बनने के बाद भी सात साल लग गये पटरी बिछाने में

गौरतलब है कि यह रेल महासेतु 7 साल पहले ही बन गया था. लेकिन इस पर पटरी नहीं बिछाई गई थी. पूरे पुल को बनाने में करीब 17 साल लग गए. इस पुल की कुल लंबाई 1.88 किलोमीटर है. इसमें 45.7 मीटर लंबाई के ओपन वेब गार्डर वाले 39 स्पेन हैं. नए पुल का स्ट्रक्चर एमबीजी लोडिंग क्षमता के अनुरूप डिजाइन किया गया है.

मोदी सरकार ने काम में तेजी लाने को कहा था….

केन्द्र की मोदी सरकार की इस महासेतु पर पैनी निगाह थी। अटल जी के इस सपने को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए रेल मंत्रालय से स्पष्ट निर्देश जारिए किए गय़े थे कि जल्द से जल्द इसका काम फाइनल किया जाए। औऱ ट्रेन चलने की प्रक्रिया शुऱू की जाए। आपको बता दें कि कुछ दिन पहले भी रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि जोनल रेलवे को काम तेजी से पूरा करने के लिए कहा गया है और अधिकारियों ने कहा कि यह पुल कमोबेश पूरा हो गया है. रेल मंत्री ने यह भी कहा था कि यह पूर्व मध्य रेलवे की प्राथमिकता वाली परियोजनाओं में से एक है. हालांकि पुल को अभी तक सुपौल के निर्मली की तरफ से जोड़ा जाना बाकी है, जिसके लिए काम प्रगति पर है. गौरतलब है कि रणनीतिक दृष्टि से इस महत्वपूर्ण पुल को 2003 में 323.41 करोड़ रुपये की लागत से बनाने का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया था. इसके बाद के 17 वर्षों में लागत में इजाफा हुआ है और यह लगभग 516.02 करोड़ रुपये में पूरा होने की उम्मीद है.

पटना औऱ सुपौल से मौर्य न्यूज18 की खास रिपोर्ट ।