लॉकडाउन में लेडीज ! वो अकेली खुद में कहीं खो गई..! Mauray News18

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विशेष रिपोर्ट । लेडी…लाइफ…और लॉकडॉउन !

प्रीति भीमसारिया, पटना, मौर्य न्यूज18 ।

लेडीज…। लाइफ..। लॉकडॉउन..।  कोरोना का संक्रमण और जिम्मेदारी। और इन सब के बीच महिलाएं। आखिर ये समझना जरूरी है…कि कैसी चल रही इनकी जिंदगी। दुनिया को पता है भारतीय समाज में बेटी जन्म से ही लॉकडाउन का सामना करती है। जब बच्ची होती है तो माता-पिता-भाई के लॉकडाउन में फिर जब ब्याही जाती है तो पति और ससुरालवालों के लॉकडाउन में। ऐसे में पूरा जीवन लॉकडाउन वाली और सबको लेकर खुश रहना । इन सब के बीच अब एक नया लॉकडाउन जो कोरोना की वजह से हुआ। ऐसे वक्त में एक बेटी, एक बहन, एक बहू, एक मां को समझते हैं, इस रिपोर्ट के जरिए…ये रिपोर्ट ये बताती है कि एक अकेली वो जो खुद में कहीं खो जाती है। पढ़िए मौर्य न्यूज18 के लिए पटना से प्रीति भीमसारिय की ये खास रिपोर्ट।

नमस्कार।

मौर्य न्यूज18 डॉट कॉम में आपका स्वागत है।

वर्तमान समय में चर्चा में आए मुद्दों में “लेडीज और लॉकडाउन “ सर्वाधिक नवीन और अहम मुद्दों में एक है I करोना नामक वैश्विक महामारी ने जितनी तेजी से अपना संक्रमण फैलाया है, उतनी ही तेजी से व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र  विश्व के समस्त मुद्दों पर अपना  व्यापक प्रभाव डाला है । समग्र रूप में यदि यह कहा जाए कि इसके विनाशकारी प्रभाव से जीवन का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं रहा, तो यह बात अतिशयोक्ति नहीं होगी ।


 जैसा कि हमारे चर्चा का विषय इसी से संबंधित है “ लेडीज और  लॉकडाउन “ काफी मिलता-जुलता सा स्वरूप है, इन दोनों शब्दों का यूं तो हमारे पुरुष प्रधान समाज में औरतें एक प्रकार के लॉक में ही रहती चली आई है परंतु लॉक के साथ डाउन जुट कर उनकी  स्थिति को वास्तविक रूप में और अधिक डॉउन ही किया है।

 

इस लॉकडाउन में दिन प्रतिदिन उनकी स्थिति विषम से विकृत होती चली गई है I लॉकडाउन के व्यवहारिक रूप में आते ही औरतों का शारीरिक और मानसिक दोनों पक्षों का विघटन  शुरू हो गया I  यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेस के अध्ययन के आधार पर पता चलता है कि मानसिक समस्याओ में जहां पुरुषों का आंकड़ा 7% से 18% पहुंचा वहीं औरतों का आंकड़ा 11% से 27% हो गया I


 

और ये सब छूटता चला गया..।

नौकरी पेशा लोगों की नौकरी छूटी, व्यापारियों का व्यापार छूटा, बच्चों के स्कूल छूटे, बुजुर्गों का पार्क छूटा… लेकिन इन सब के बीच कुछ ना छूटा तो था… बस औरतों से की जाने वाली जरूरत से ज्यादा उम्मीद। अपेक्षाएं । रसोई में बढ़ते व्यंजनों की मांग । हर किसी के आदेश का यस में जवाब देने के लिए तैयार रहना। सबकी फरमाइश पूरी करते रहना। परिवार के अनुरूप खुद को ढ़ाल के रखना। बच्चों की परवरिश, बच्चों की  धमाचौकड़ी के बीच घर में  उत्पन्न अव्यवस्था को संवारते रहना। दिनचर्या में परिवार के बीच अनुशासन और नियम की उड़ती धज्जियों को निहराते रहना । (सोशल डिस्टेंसिंग ) सामाजिक दूरी के नाम पर घर के सहायक कर्मचारियों को गेट ऑउट का आर्डर पास करना । और उसकी भी जिम्मेदारी घर की महिलाओं पर ही। कहने की बात नहीं कि … एक इकलौती लेडी ही…एक इकलौती महिला ही…लॉकडाउन में…खुद में कहीं खोती रही। गोते लगाते रही। नम आंखों में भी मुस्कुराती रही।

कहते हैं…नशा शराब में होती तो नाचती बोतल। लेकिन पुरूष प्रधान समाज में …परिवार में….एक महिला से सारा कुछ कर गुजरने का नशा…सारी उम्मीदें पालने का नशा…वक्त-वक्त पर पुरुष करते रहे बोतलों का नशा… सच कहूं तो नाचती रही वो….खुद में कहीं खोती रही वो।

बिहार में शराब के नशे पर प्रतिबंध है लेकिन लॉक़-डाउन में दिल्ली हो या बेंगलूरू के नशे के अड्डों पर बोतल लेने की होड़ जिस कदर दिखी,  सिर शर्म से झुक गया। लॉक-डाउन ने सब पोल पट्टी खोल कर रख दी। आश्चर्य तब और हुआ जब महिलाएं भी अपनी कतार बना रखी थी। बिहार में भी आए दिन ऐसी चीजों की धर-पकड़ होती रहती हैं…इसलिए दावे के साथ ये नहीं कहा जा सकता कि यहां ये सब थम ही गया है।

खैर, इन सब के बीच महिला जो साथ में वक्त बिताकर प्यार और सम्मान बढ़ने की उमंग में गोते लगाने की सोंचती रही…वो होते..होते…रह सा गया। पति गाहे-बगाहे प्यार और हिंसा दोनों दिखा गए। हमने इस संबंध में आस-पड़ोस की महिलाओं से जानने वाली बेटियों से…बहनों से बात भी की। सबके भाव बस रहने भी दो वाली थी।

जिस पति के पास घर में रहने को वक्त ना था..वो जब घर में जमकर बैठे तो कुछ दिन तो ठीक चला लेकिन धीरे-धीरे घर में भी दफ्तर की तरह रौब में आ गए। महिलाएं और बच्चे ये सोंचने पर मजबूर हुए कि पहले वाला ही बेटर था..दफ्तर जाना…लेट से घर आने में ही ज्यादा प्यार था…मिलन की खुशबू थी। आनंद था। रेगूलर घर में बंद दिमाग की बत्ती भी गुल कर गया था मानो।

मतलब साफ है….ऐसी स्थिति में महिलाओं के दिमाग में भी कई मानसिक समस्याएं अंदर ही अंदर घर बनाना शुरू कर दी । जिससे स्वस्थ दिनचर्या, व्यायाम, सुबह की टहल आदि भी उनके जीवन शैली से विलुप्त हो गई फलस्वरूप शारीरिक रूप से  47%( अध्ययन के अनुसार) महिलाएं मोटापे का भी शिकार हुई । आर्थिक संसाधन भी सीमट गए । परेशानियां उन्हें झेलनी पड़ी ।


वर्क टू होम करने वाले पुरूष टेंशन आने पर घरवालों पर टेंशन उतार-उतार कर लगभग नो टेंशन में जीते रहे…लेकिन वो….वर्क होम में भी दफ्तर और घर को एक सिर-पांव पर उठाकर सब काम करती रही। विनाशकारी वक्त गुजरता रहा। अपनी संज्ञा…अपनी पहचान भी खोती…मुस्कुराती…। वो अकेली..खुद में खोकर….कम खा कर…गम खा कर…मुस्कुराकर…वो अकेली। खुद में कहीं खो गई।

पटना से मौर्य न्यूज18 के लिए प्रीति भीमसारिया की रिपोर्ट ।

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