देश में बदली शिक्षा व्यवस्था के वर्तमान ढांचा को समझिए ! Maurya News18

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New Education Policy 2020

नई शिक्षा नीति पर विशेष रिपोर्ट । पार्ट -2 ।

नई नीति में जिज्ञासा, खोज, अनुभव और संवाद को शिक्षा का आधार बनाया गया है

नई दिल्ली, मौर्य न्यूज18 ।

नई शिक्षा नीति को आप आसानी से समझ सकें, मौर्य न्यूज18 इस संबंध में अधिक से अधिक और बेहतर जानकारी आप तक पहुंचाने के लिए कड़ी-दर-कड़ी रिपोर्ट पेश कर रहा है। पहली कड़ी में हमने ये जानकारी दी कि आखिर शिक्षा नीति बनी कैसे और किसने बनाई साथ ही उदेश्य पर फोकस था। अब दूसरी कड़ी पेश कर रहा हूं इस कड़ी में आप जानेंगे कि इस नीति में वर्तमान ढ़ांचा क्या है…किस तरह नई नीति से बच्चों की शिक्षा स्तर में बढ़ोतरी होगी और बेहतर-बेहतर शिक्षा दी जा सकेगी। इन सब को जानने के लिए पढ़िए नई दिल्ली से हमारे अतिथि संपादक रामनाथ राजेश की विशेष रिपोर्ट ।

नई शिक्षा नीति के लागू हो जाने के बाद शिक्षा के  वर्तमान ढांचे यानी 10 +2+3 का स्वरूप बदल जाएगा. इसकी जगह 5+3+3+4 की‌ नई‌ व्यवस्था लागू की गई है. सबसे बड़ी बात यह है अब बच्चे को रटवाने यानी याद कराने पर जोर ना देकर उसमें किसी चीज को जानने की जिज्ञासा पैदा करने पर बल दिया जाएगा. जिज्ञासा, खोज, अनुभव और संवाद को शिक्षा का आधार बनाया जाएगा.

इस नई नीति में बच्चे को स्कूल के लिए तैयार करने की बात कही  गई है. इसका आधार यह है कि वैज्ञानिक शोध में पाया गया है कि बच्चों का दिमाग 85 प्रतिशत तक विकास 6 साल का होने से पहले ही हो जाता है. यानी उनके दिमाग का सही विकास हो इसके लिए शुरुआत के छह वर्ष सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. इसलिए नई शिक्षा नीति में अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड एजुकेशन (ईसीसीई) यानी प्रारंभिक बचपन की देखभाल एवं शिक्षा पर जोर दिया गया है.

पढ़ाकर नहीं दिखाकर सिखाने पर रहेगा जोर

 इसके तहत 3 साल में बच्चे को मानसिक रूप से पढ़ाई के लिए तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की जानी है. यानी बच्चे को यह भी नहीं पता चले कि उसे पढ़ाया जा रहा है और वह सीखना भी शुरू कर दे. जैसे खेल, कठपुतली, चित्रकला, पेंटिंग, नाटक, संगीत आदि गतिविधियों में शामिल कर उनका मनोरंजन करना है और इसी तरह से वे भाषा, रंग, संख्या, आकार आदि खुद सीख जाएंगे. स्कूल में आपस में सहयोग करना, स्वच्छता, अच्छा व्यवहार, नैतिकता ये सारे गुण वे छह साल के होने के पहले ही सीख जाएंगे. इसके लिए आंगनबाड़ी केंद्रों को सुविधा संपन्न बनाने पर जोर दिया गया है. कल्पना यह है कि पांच साल उम्र होने के पहले हर बच्चा कक्षा एक से पहले बाल वाटिका में जरूर पहुंच जाए. लक्ष्य यह है कि बच्चा के तीसरी कक्षा में पहुंचने तक उसे मूलभूत साक्षरता और संख्या का ज्ञान जरूर हो जाए. 

ऐसा है बुनियादी से माध्यमिक शिक्षा तक का स्वरूप

इसे इस तरह से समझना बेहतर रहेगा. बच्चे के जन्म लेने से तीन साल की उम्र तक वह आंगनबाड़ी या बाल वाटिका में रहेगा और दो साल वह पहली और दूसरी कक्षा में पढ़ेगा. इसे बुनियादी शिक्षा के तहत रखा गया है. यानी पांच साल बुनियादी शिक्षा के हो गए. 

 इसके बाद के तीन साल यानी आठ साल की उम्र होने तक वह तीसरी कक्षा से पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई करेगा. जिसे प्रारंभिक शिक्षा नाम दिया गया है. इसके बाद 11 से 14 साल की उम्र तक वह कक्षा छह से आठ तक पढ़ेगा जिसे मध्य कहा गया है. इसके बाद 14 से 18 साल की उम्र तक वह 9 वीं कक्षा से 12 वीं कक्षा तक की पढ़ाई करेगा. जिसे माध्यमिक नाम दिया गया है. इस तरह 5+3+3+3+4 पढ़ाई की व्यवस्था लागू की गई है.  

रटने की जगह समझने पर बल 

 वर्तमान शिक्षा नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि  इसमें छात्रों को रटाने की जगह उनके समझने और नया कुछ सोचने के लिए प्रेरित करने पर ज्यादा जोर दिया गया है.सबसे मजेदार बात यह रहेगी कि बच्चे अब स्कूल जाने से घबराएंगे नहीं, उन्हें यह नहीं लगेगा कि स्कूल में वे पढ़ने के लिए जा रहे हैं क्योंकि पढ़ने की जगह सीखने पर ज्यादा जोर होगा.

मातृभाषा में ही पांचवीं तक पढ़ाई 

 बच्चों पर  घर का माहौल बदलने की वजह से मानसिक दबाव नहीं पड़े इसके लिए पांचवी कक्षा तक पढ़ाने का माध्यम वही रखने की बात कही गई है जो बच्चों की मातृभाषा है. यानी भोजपुरी भाषी बच्चा पांचवी कक्षा तक भोजपुरी में ही स्कूल में पढ़ेगा,  चाहे वाह गणित हो या विज्ञान. इसी तरह मिथिलांचल के बच्चे को स्कूल में मास्टर साहब मैथिली में ही पढ़ाना शुरू करेंगे. इसका अर्थ यह होगा कि बच्चे पर कम उम्र में कोई नई भाषा सीखने का दबाव नहीं रहेगा. अंग्रेजी एक विषय के रूप में तो रहेगा लेकिन पढ़ाने का माध्यम नहीं होगा. यह भी कहा गया है कि यदि संभव हो तो मातृभाषा को पढ़ाने के माध्यम को आगे भी जारी रखा जा सकता है.

 बच्चों पर  घर का माहौल बदलने की वजह से मानसिक दबाव नहीं पड़े इसके लिए पांचवी कक्षा तक पढ़ाने का माध्यम वही रखने की बात कही गई है जो बच्चों की मातृभाषा है. यानी भोजपुरी भाषी बच्चा पांचवी कक्षा तक भोजपुरी में ही स्कूल में पढ़ेगा,  चाहे वाह गणित हो या विज्ञान. इसी तरह मिथिलांचल के बच्चे को स्कूल में मास्टर साहब मैथिली में ही पढ़ाना शुरू करेंगे. इसका अर्थ यह होगा कि बच्चे पर कम उम्र में कोई नई भाषा सीखने का दबाव नहीं रहेगा. अंग्रेजी एक विषय के रूप में तो रहेगा लेकिन पढ़ाने का माध्यम नहीं होगा. यह भी कहा गया है कि यदि संभव हो तो मातृभाषा को पढ़ाने के माध्यम को आगे भी जारी रखा जा सकता है.

बच्चों को प्राकृतिक माहौल देने पर जोर 

नई शिक्षा नीति में एक बात जो सबसे अच्छी लग रही है वह बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयार करने की है. आंगनबाड़ी या बाल वाटिका जैसी संस्थाएं बच्चों को स्कूल जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने का काम करेंगी. ऐसी संस्थाओं में बच्चों को करीब-करीब प्राकृतिक माहौल में रखा जाता है और उनकी देखभाल पर ज्यादा  ध्यान दिया जाता है. आंगनबाड़ी में बच्चों की देखरेख पर ही सारा फोकस होता है. फ्री स्कूलिंग में पढ़ाने की जगह सिखाने की बात की जाती है. अब जो नई शिक्षा नीति है उसमें भी सिखाने पर ही अधिक जोर है.

अब अगली कड़ी में नई शिक्षा नीति में शिक्षकों के लिए क्या है। मसलन, शिक्षकों के प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीक को कैसे अपनाएं इस विशष में बात करेंगे। जो जानना, समझना बहुत ही जरूरी है। इसके लिए बने रहिए मौर्य न्यूज18 डॉट कॉम के साथ। और ये शिक्षा नीति जन-जन तक पहुंचे जरूरी है आपका साथ। खबरों को शेयर करें। लिंक को अपने फेसबुक वॉल पर भी लगाएं। इस तरह मौर्य न्यूज18 का साथ दें।

मौर्य न्यूज18 परिवा की ओर से धन्यवाद !

गेस्ट रिपोर्ट ।

आपने रिपोर्ट लिखी है ।

रामनाथ राजेश

आप वरिष्ठ पत्रकार हैं और लेखक भी। आप देश के विभिन्न राष्ट्रीय समाचार पत्रों में संपादकीय विभाग में उच्च पदों पर योगदान देते रहे हैं।