कुशवाहाजी ! नौ साल बाद पुनर्मूषको भव। Maurya News18

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मौर्य न्यूज18, पटना

अतुल कुमार

कुशवाहा जी…कोशिश थी कुछ बड़ा करूं। कोशिश ये भी थी कि नीतीश कुमार का विकल्प बनूं। चाहत ये भी कि मुख्यमंत्री बनूं। लेकिन नौ साल हो गए। कभी सांसद तो कभी केन्द्रीय मंत्री तो कभी खाली-खाली बैठे-बैठे सोचते रहे क्या करूं क्या ना करूं। ये सब सोचते-सोचते इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ लंबी छलांग लगाने की कोशिश भी की। लेकिन हांफ गए। हांफते-हांफते कह दिया, अब और नहीं। प्रभु अब और नहीं। हे ! प्रभु कुछ कर। प्रभु ने सुन भी ली और कह दिया जा तू जहां से आया है वहीं जा। नीतीश कुमार भी इस बार मार खाए हुए बेचारे, लाचार मुख्यमंत्री करते तो क्या करते मौका था, सो कह दिया आ लग जा गले। अब कौन किसके गले लगा या किसके गले पड़ा। ये तो भविष्य में पता चलेगा। फिलहाल तो कुशवाहा जी ! पुनर्मूषको भव।

कभी हां, कभी ना का सिलसिला काफी लंबा चला लेकिन आखिरकार 14 मार्च, रविवार को उपेंद्र कुशवाहा ने अपना वजूद खत्म कर जेडीयू का दामन थाम लिया। अब वे एक बार फिर से अपने बड़े भाई नीतीश के साथ कदम-से-कदम मिलाकर राजनीति की सीढ़ियां चढेंगे। यही तो सियासत है मेरे भाई, खूब गाली दीजिए, खूब बयानबाजी कीजिए और जब अपने स्वार्थ की पूर्ति करनी हो तो तथाकथित बड़े भाई की गोद में जा बैठिए।

एक वक्त ऐसा लग रहा था कि उपेंद्र कुशवाहा राजनीति की बिसात पर ऐसी चाल चलेंगे कि सियासतदां भी देखते रह जाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। केंद्र में मानव संसाधन राज्य मंत्री बनाए जाने के बाद उनकी राजनीति में धार देखने को मिला था। फिर अलग पार्टी रालोसपा बनाने के बाद ऐसा लगा कि अब वे कुछ गुल खिलाएंगे लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा और वे फिर से अपनी पुरानी जगह पर लौट आए।

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त कुशवाहा ने महागठबंधन की ओर से नीतीश को ललकारा। तेजस्वी के साथ बंद कमरे में कई बार बातें भी हुईं लेकिन सीटों की संख्या पर सहमति नहीं बन पाई लिहाजा वहां से निकल लिए और कुछ छोटी-छोटी पार्टियों को जोड़कर चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे। हालांकि उनकी पार्टी को एक भी सीट जीतने में सफलता नहीं मिली और बिहार की राजनीति में वे अलग-थलग पड़ गए।

कुछ लोग, राजनीति के मौसम वैज्ञानिक रामविलास पासवान की तरह बनने चाहते हैं लेकिन उनकी तरह जनता की नब्ज टटोलने में माहिर नहीं होते लिहाजा चारों खाने चित हो जाते हैं।     

कहें तो वे जाति की राजनीति से कभी बाहर नहीं निकल पाए। सर्वहारा की बात जरूर की लेकिन सर्वहारा के हो न पाए।      

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने RLSP के 150 नेताओं के साथ उपेंद्र कुशवाहा ने रविवार को JDU की सदस्यता ले ली। उन्होंने बिना शर्त और बिना लोभ के JDU में शामिल होने की बात कही है। हालांकि उन्हें तत्काल प्रभाव से JDU की पार्लियामेंट्री बोर्ड का चेयरमैन बना भी दिया गया है।

JDU में शामिल होने के बाद क्या कहा कुशवाहा ने

9 साल नीतीश से दूर रहने के बाद रविवार को कुशवाहा जेडीयू के हो गए। इस मौके पर उन्होंने कहा कि मैंने बहुत उतार-चढ़ाव देखा है, जनता के आदेश पर नीतीश कुमार के साथ आया हूं। जब तक जीवन है, तब तक नीतीश कुमार के साथ काम करूंगा। बिना शर्त के साथ आया हूं, जो वे तय करेंगे वो मान्य होगा।

तेजस्वी यादव पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग मंसूबा पाल रहे हैं। उन्हें एक बार फिर मौका चाहिए बिहार को आतंक और पाखंड में झोंकने का। बिहार का खजाना खाली करना चाहते हैं। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा के रहते ऐसा नहीं हो सकता है। वहीं, CM नीतीश कुमार ने कहा कि काफी दिनों से बातचीत चल रही थी, उपेन्द्र जी की पार्टी हमारे साथ आ गई है। इससे काफी खुशी हो रही है। हमलोग मिलकर राज्य और देश की सेवा करेंगे।

विलय से पहले रविवार को कुशवाहा ने कहा कि नीतीश कुमार मेरे बड़े भाई हैं, वही पार्टी में मेरी भूमिका को तय करेंगे। उन्होंने कहा कि दो दिन की बैठक के बाद राज्य और देश की परिस्थितियों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। सामान्य विचारधारा के लोगों के साथ एक मंच पर होना चाहिए। समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान और बराबरी पर लाने के लिए JDU में पार्टी का विलय कर रहा हूं।

रालोसपा का जेडीयू में विलय होने के बाद खुशी की मुद्रा में उपेंद्र कुशवाहा और सीएम नीतीश कुमार

जान लीजिए क्या हुई है डील

सूत्रों के मुताबिक पूर्व केंद्रीय मंत्री व RLSP प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी स्नेह लता को विधान परिषद का सदस्य बनाया जाएगा। JDU उन्हें राज्यपाल कोटे से MLC बनाएगी। मंत्रिमंडल विस्तार कर नीतीश कुमार उन्हें अपनी सरकार में जगह देंगे। शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी दी जा सकती है। जबकि उपेंद्र कुशवाहा को केंद्र की राजनीति के लिए राज्यसभा भेजा जाएगा। राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि इन्हीं शर्तों पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उपेंद्र कुशवाहा की डील हुई है।

जेडीयू में रहते हुए नीतीश को कहा था तानाशाह

JDU से राज्यसभा सांसद बनने के बाद 2012 में उपेंद्र कुशवाहा ने एक बार फिर पार्टी से अलग लाइन ले लिया था। FDI बिल पर अलग वोट किया, जिससे नीतीश कुमार नाराज हो गए थे। पार्टी में रहते हुए ही कुशवाहा ने नीतीश कुमार को तानाशाह तक कह डाला था। फिर राजगीर में हो रहे जदयू के कार्यकर्ता सम्मेलन की भरी सभा में उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार के सामने इस्तीफा देने का प्रस्ताव रख दिया। बाद में पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा भी दे दिया था। 2013 में उपेंद्र कुशवाहा ने जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार के साथ मिलकर RLSP नाम की एक नई पार्टी बनाई थी।

आइए एक नजर डाल लेते हैं उपेंद्र कुशवाहा के राजनीतिक सफर पर

उपेंद्र कुशवाहा का जन्म 6 फरवरी, 1960 को बिहार के वैशाली जिले के जावज गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम स्वर्गीय मुनेश्वर सिंह और माता का नाम श्रीमती मुनेश्वरी देवी है। उनकी पत्नी का नाम स्नेहलता कुशवाहा है। वे एक बेटा और एक बेटी के पिता हैं।

शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने बिहार यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में स्नात्कोत्तर किया और जंदाहा के समता कॉलेज में व्याख्याता बने। अब इस कॉलेज का नाम मुनेश्वर सिंह मुनेश्वरी समता कॉलेज है। 1985 में राजनीति के क्षेत्र में उनका पदार्पण हुआ। 1985-88 तक वे युवा लोक दल के राज्य महासचिव रहे। इसके बाद 1988-93 तक युवा जनता दल के राष्ट्रीय महासचिव रहे। 1994 से 2002 तक वे समता पार्टी के राज्य महासचिव रहे। 

3 मार्च, 2014 को रालोसपा का किया गठन

2002-2004 के बीच वे बिहार विधानसभा में समता पार्टी के उपनेता रहे। 2004-05 के बीच वे बिहार विधानसभा में समता पार्टी के और विपक्ष के नेता रहे। 2010-13 के बीच वे राज्यसभा सांसद रहे। 3 मार्च, 2014 को उन्होंने राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ( रालोसपा )की स्थापना की। बिहार के ऐतिहासिक गांधी मैदान में हुई रैली में उन्होंने अपनी पार्टी के नाम और झंडे का अनावरण किया था।

2014 में उन्होंने राष्ट्रीय समता पार्टी से चुनाव लड़ा और कराकट से 16वीं लोकसभा के लिए चुने गए। वे एनडीए के घटक दलों में शामिल थे। पीएम मोदी के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार में उन्हें मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री बनाया गया। 9 दिसंबर, 2018 तक वे इस पद पर कायम रहे।

रालोसपा शुरू में भाजपा की सहयोगी पार्टी थी लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद जदयू के राजग में दोबारा शामिल होने पर उसे राजग छोड़ना पड़ा।

कोइरी जाति पर था भरोसा

नवंबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में कुशवाहा अपने ही क्षेत्र से चुनाव हार गए। इसके बाद कुशवाहा ने कोइरी जाति का समर्थन जुटाना शुरू कर दिया। उस वक्त कोइरी और कुर्मी समाज जेडीयू का मुख्य वोटबैंक था। आधिकारिक तौर पर किसी भी जाति की ठीक-ठीक जनसंख्या बताना तो मुश्किल है, लेकिन बिहार की राजनीति पर नजर रखने वालों का मानना है कि बिहार में कुर्मी 2 से 3 फीसदी हैं, जबकि कोइरी 10 से 11 फीसदी।

पटना से मौर्य न्यूज18 के लिए अतुल कुमार की रिपोर्ट ।