बिहार में कुशवाहा लीडर कौन ? बीजेपी के सम्राट चौधरी या जदयू के उपेन्द्र ! Maurya News18

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जदयू की “कुशवाहा’ पॉलिटिक्स :

मुझको जो पसंद है वही कुशवाहा है…!

क्या जदयू के भरोसे रहेगी बीजेपी या…!

युवा सम्राट में और जान डालेगी भाजपा !


नयन, मौर्य न्यूज18, पटना ।

मुझको जो पसंद है वही बात करेंगे। अभी सभी दलों की पहली पसंद हैं कुशवाहा। बिहार में हर पार्टियां कह रही हैं…कुशवाहा तो तेरे पास भी है…मेरे पास भी है। लेकिन जदयू की चाल ये कह रही है कि जो मेरे पास है वही कुशवाहा है। बाकी का क्या। कह सकते हैं…जदयू की कुशवाहा वाली पॉलिटिक्स बिहार में गनगना रही है। इस राजनीति में चोट किस पर है।


सुना ही ही होगा आपने। कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना। बस इस राजनीति में यही समझ लीजिए…ऐसा ही कुछ है। जदयू के नीतीश कुमार इसबार चोट खाए मुख्यमंत्री हैं। पार्टी को विधानसभा में जब से पटखनी मिली है। सरकार बनाने के बाद भी बेचैनी कायम है। नींद उड़ी है ये सोच कर कि मैं 45 का कैसे हो गया। गणित साफ है…जदयू को चोट लगी है। चिराग पासवान तो बहाना हैं…निशाना तो बीजेपी पर है। बीजेपी की चाल पर है। तू डाल..डाल तो मैं पात-पात। कुछ ऐसा ही चल रहा है जदयू और बीजेपी के बीच। क्योंकि दोनों के पास एक-एक दिग्गज कुशवाहा लीडर हैं…एक ओर बिहार के सीनियर लीडर शकुनी चौधरी के पुत्र सम्राट चौधरी हैं तो दूसरी ओर उपेन्द्र कुशवाहा। बाकी हैं भी तो मास लीडर के तौर पर पहचान नहीं बना पाए हैं। तो समझते हैं कुशवाहा की राजनीति को…और आप भी गौर करिए…समझिए। कुशवाहा पर दिल लुटाए क्यों बैठे हैं जदयू के मुखिया नीतीश कुमार।

आइए कुशवाहा जी, जदयू में आपका स्वागत है। आते-आते बहुत देर कर दी। पर कोई बात नहीं कुशवाहा जी। लीजिए अब सबकुछ तेरा है…मेरा क्या। मैंने तो जी ली अपनी जिंदगी। फिल्मी स्टाइल में आ सिमरन आ…टाइप से उपेन्द्र कुशवाहा का जदयू में खूब स्वागत हुआ। और पार्टी कार्यालय में उनकी पार्टी रालोसपा को जदयू की वैक्सीन दे दी गई।

और कहा जाने लगा…अब तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है। इसी तर्ज पर कुशवाहा का जदयू में स्वागत दर स्वागत चलता रहा। कह सकते हैं…14 मार्च, 2021 को जदयू ने जश्न-ए-कुशवाहा मनाया और गले लगा लिए गए। वैसे कहने वाले ये भी कहते हैं…नीतीश जी गले लगाया तो ठीक है…पर ये वही कुशवाहा जी हैं जो आपके जैसे ही उसूल के पक्के हैं। कुछ भी खटपट हुई तो फिर निकल ना लें। बहुत संभाल कर रखिएगा। फिर भी इतना रिस्क आपने लिया है तो कोई वजह तो होगी। वजह, साफ दिखती भी है।


वजह पर गौर फरमाइए। नीतीश कुमार ने जब समता पार्टी बनाई थी तो एक नारा गूंजा था…लव-कुश एकता जिंदाबाद। इसमें लव-कुश – नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी थे। याद करिए वो दिन जब नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी की जोड़ी हिट और फिट मानी जाती थी। लेकिन नीतीश कुमार…लालू प्रसाद खेमे से निकले थे। बीजेपी का साथ मिला था। सत्ता भी हाथ लग गई थी। ऐसे में धीरे-धीरे कुशवाहा लीडर शकुनी चौधरी को किनारे करने का प्लान बना…फिर क्या… धीरे-धीरे/ हौले-हौले किनारे कर दिए गए। शांत मिजाज के शकुनी चौधरी…दिग्गज लीडर होकर भी खून के घूंट पीकर निकल लिए और अपनी पारी धीरे-धीरे समाप्ति की ओर ले गए। बेटे सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाया। उन्होंने भी अपनी चाभी पुत्र सम्राट चौधरी को सौंपी। वे पहले तो राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के साथ रहे लेकिन नीतीश कुमार को ये भी पसंद नहीं पड़ा तो अपने खेमे में खींच लिया ।

जदयू लीडर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी, कुशवाहा लीडर । समता पार्टी की स्थापना साथ-साथ की । फाइल फोटो ।

जरा याद करिए…कुशवाहा प्रेम की।


आप सोच रहे होंगे कि ये सब मैं आपको क्यों याद दिला रहा हूं तो साफ है कि कुशवाहा हमेशा किसी भी स्थिति में जदयू के साथ ही रहे, ऐसा नीतीश कुमार हमेशा से करते रहे हैं। उनकी नजर हमेशा से बिहार के सभी दलों में कुशवाहा के कद-काठी पर रही है। कोई भी कुशवाहा उनकी लंबाई से आगे नहीं बढ़े, इसका वे बारिकी से ख्याल रखते हैं। वजह भी साफ है कि बिहार में कुश यानी कुशवाहा की आबादी, लव यानी कुर्मी जाति की आबादी से कहीं ज्यादा है। सो, वोटर भी कुशवाहा जाति से ज्यादा हैं और लव-कुश वोटर ही जदयू को शुरू से ताकत देते रहे हैं।


लेकिन समय के साथ-साथ सीन भी बदला। उपेन्द्र कुशवाहा जैसे दिग्गज नेता भी नीतीश कुमार के खेमे से अलग हो लिए और पानी पी-पीकर नीतीश कुमार को कोसने लगे। जैसा कि नीतीश कुमार भी लालू प्रसाद के लिए करते रहे हैं और अपना कद बढ़ाते रहे हैं। वैसे मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी राजनीति सुशासन कहकर उफान मारती रही। लेकिन कितने दिनों तक सुशासन के नाम पर राजनीति होगी। जनता कुछ बातों से उबती भी है और बिहार में जातीय राजनीति इतनी हावी है कि समीकरण जाति के आधार पर ही बनते हैं। ये बिहार की राजनीति की मजबूरी भी है। सो, बिहार में जो भी लीडर उभरे वे जातीय राजनीति के आधार पर ही उभरे। चाहे वे लालू प्रसाद हों, नीतीश कुमार हों, शकुनी चौधरी हों, रामविलास पासवान हों या उपेन्द्र कुशवाहा हों।

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खैर, फिर से चलते हैं कुशवाहा की राजनीति पर। पिछले दिनों तक कुशवाहा की राजनीति का जो सीन रहा…वो, साफ तौर पर बिखरा-सा रहा। उपेन्द्र कुशवाहा कुछ दिनों तक बीजेपी के साथ मिलकर केन्द्र में रहे और भाजपा को मजबूती प्रदान करते रहे। इस बीच भाजपा कुशवाहा के दिग्गज नेता शकुनी चौधरी समेत उनके बेटे सम्राट चौधरी को अपनी पार्टी में शामिल करा चुकी थी। यानी कुशवाहा जाति पूरी तरह से मजबूती के साथ बीजेपी के खेमे में रही।

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ऐसे में सीन क्या बना।

भाजपा के सम्राट चौधरी भी कुशवाहा और भाजपा का साथ देने वाले उपेन्द्र भी कुशवाहा। यानी जदयू के पास कुशवाहा के नाम पर ठन-ठन गोपाल वाली स्थिति बन गई। लेकिन दम साधे…जदयू। थोड़ी अकड़ के साथ खुद को ही बुलंद करने में लगी रही…ये सोचकर कि ये लोग क्या बिगाड़ लेंगे। नीतीश कुमार भी अपनी जिद के लिए जाने जाते हैं। सो, उन्होंने पूरी तरह से अपने खेमे में कुशवाहा को खंगालना शुरू किया। उन्हें मजबूत कुशवाहा लीडर बनाने में ताकत झोंकी। लेकिन जो भी उनके खेमे वाले कुशवाहा थे…वे बेनामी कुशवाहा थे…वे उभर नहीं सके। जबकि प्रयास में कोई कमी नहीं की गई…कुछ को खोज-खोज कर अपनी पार्टी में शामिल करा कर उसे कुछ बड़े पद भी सौंपे। हाई लाइट भी करने की कोशिश की। युवा का प्रदेश अध्यक्ष भी कुशवाहा को बनाया। मंत्री भी बनाया। जदयू का प्रदेश अध्यक्ष भी कुशवाहा को बनाया। लेकिन बात बनी नहीं। 2021 में विधानसभा का रिजल्ट आया तो मुक्की खा गए। विश्लेषण किया तो लगा लव-कुश को एक किए बिना कुछ नहीं होगा।

पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी, भाजपा लीडर ।


इधर, भाजपा से उपेन्द्र कुशवाहा अलग हुए तो भाजपा भी चेत गई। और तुंरत से कुशवाहा के दिग्गज लीडर शकुनी चौधरी के पुत्र सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाने की कोशिश में जी-तोड़ मेहनत करने लगी। सम्राट चौधरी जो युवा हैं और नॉलेज वाले इंसान हैं, अच्छी छवि भी है। भाजपा की बांछे खिली थीं कि मेरे पास तो सम्राट है। कुशवाहा का सम्राट। भाजपा का सम्राट बनेगा। कुछ इसी सोच के साथ भाजपा ने सम्राट को आगे करने की कवायद तेज की।

भाजपा लीडर पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी । कुशवाहा लीडर ।

! अंदरूनी बात क्या थी…कौन बताएगा।

लेकिन अंदरूनी बात अगर पता करेंगे तो जदयू इसपर हमेशा मुंह बिचकाती रही। भाजपा ने अपने नेता सम्राट चौधरी को सांसद भी बनाने की कोशिश की पर ऐसा हो ना सका। भाजपा अपने कुशवाहा लीडर को राज्यसभा भेजना चाही पर ऐसा हो ना सका। जरा पता करिएगा क्यों नहीं हो सका। राज खुलते दिखेगा। मेरे पास कोई सबूत नहीं है इसलिए ये मैं साफ तौर पर कह नहीं सकता कि यह सब जदयू की नाराजगी मोल ना लेने की वजह से ही हुई होगी। या वहां से इसके लिए टोका-टोकी की गई होगी।


खैर, जो भी हो। इसबार 2020 के विधानसभा चुनाव में उपेन्द्र कुशवाहा अपनी डफली खुद बजा रहे थे। उनकी अपनी खेमेबाजी चल रही थी। मैदान खाली था। सो, भाजपा ने अपने सम्राट चौधरी को एमएलसी बनाकर आगे किया। चुनाव के दौरान सबसे अधिक विधानसभा सीटों पर चुनाव प्रचारक बनाकर जनता के सामने किया। ताकि कुशवाहा जाति गदगद होकर भाजपा के पाले में आ जाए। कुछ हद तक ऐसा हुआ भी। लेकिन इसका फायदा सिर्फ भाजपा को मिला। जदयू को कुशवाहा वोट के लिए तरसना पड़ा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी ।


ये सब सिर्फ कहने की बात नहीं। सब दिख रहा था। यही सब देखते हुए जदयू नेता नीतीश कुमार चोटिल मुख्यमंत्री बनने के बाद पुराने साथियों को चुन-चुनकर गले लगाना शुरू कर दिये। इसमें सबसे ज्यादा कुशवाहा प्रेम दिखा। निशाने पर तो तभी से थे…उपेन्द्र कुशवाहा। मिलना-जुलना तो चल ही रहा था। मौका और अवसर की जरूरत थी। भाजपा भी शायद इस चीज को भांप चुकी थी, सो, भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार होते ही तुरंत अपने कुशवाहा लीडर को आगे किया…सम्राट चौधरी को मंत्री पद की शपथ दिला दी। लेकिन गौर करिए यहां भी।


याद करिए जब इसबार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी जा रही थी, और मंत्री पद के लिए भी नाम दिए गये तो उसमें सबको उम्मीद थी कि भाजपा किसी और को मंत्री बनाए या नहीं सम्राट चौधरी को तो बनाएगी ही लेकिन पहले फेज में नाम नहीं आया। कुशवाहा समाज उस समय सन्न रहा गया था कि ये बीजेपी ने क्या किया। उस समय भी चर्चा उठी कि शायद जदयू की नाराजगी वजह हो।


लेकिन इस सवाल का कौन जवाब देगा। सो, सम्राट चौधरी भी मौन रहे। पार्टी के आगे के निर्णय का इंतजार करते रहे। लेकिन आप गौर करिए इसी बीच बेचैनी से जदयू कुशवाहा लीडर को आगे करने में लगा रहा। अपनी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष तक कुशवाहा को बनाया। मंत्रिमंडल में भी कुशवाहा जाति को जगह मिली। याद करिए जदयू के मेवा लाल चौधरी को। दागी होने के बाद भी कुशवाहा होने का फायदा मंत्री बनाकर दिया गया। लेकिन बाद में इतनी फजीहत हुई कि मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। यहां ये भी जानना जरूरी है कि मेवालाल चौधरी…सम्राट चौधरी के इलाके से ही आते हैं। जब जदयू की ओर से दागी मेवा लाल चौधरी को मंत्री बनाया गया तब सबका शक यकीन में बदल गया कि सम्राट चौधरी को पहले फेज में मंत्री नहीं बनाये जाने का कारण क्या रहा होगा।


खैर, एक चीज और याद करिए चेरियाबरियारपुर से मुजफ्फरपुर कांड की दागी रहीं पूर्व मंत्री मंजू वर्मा को…फिर से चेरियाबरियारपुर से विधानसभा सीट के लिए टिकट थमा दिया। ये अलग बात है कि वे हार गईं। पूर्व मंत्री कृष्णनंदन वर्मा भी आउटडेटेड हो गए। ऐसे में अब आगे क्या किया जाए। जदयू की चिंता बढ़ी। मार्केट में एक उपेन्द्र कुशवाहा ही थे जिनमें जान डाली जा सकती थी। सो, जदयू ने पूरी तरह से उन्हें गले लगाने के लिए डोरा डालना शुरू किया। सफल भी हुए।


याद करिए उपेन्द्र कुशवाहा को कैसे-कैसे गले लगाया गया। कोविड की वैक्सीन लेने जदयू के सीनियर लीडर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह और उपेन्द्र कुशवाहा कैसे साथ-साथ पहुंचे और वहां पत्रकारों के जरिए जब पूछा गया कि ये साथ-साथ होने का माजरा क्या है। तो जदयू के सीनियर लीडर वशिष्ठ नारायण सिंह ने कह दिया कि समझ लीजिए ये अभी से जदयू में हैं। और उपेन्द्र कुशवाहा ने भी कहा कि मैं नीतीश कुमार से अलग ही कब हुआ था।

ऐसी-ऐसी राजनीति की चाल आप सोचेंगे तो दिमाग चकरा जाएगा। लेकिन ठंडे पानी से माथे को धोकर फिर सोचिएगा। दोबारा मंत्रिमंडल का विस्तार जब हुआ तो सम्राट चौधरी को भाजपा ने तुरंत से मंत्री पद की शपथ क्यों दिलाई। ये भी सोचिएगा कि जब दिलाई तो कोई बड़ा विभाग क्यों नहीं दिया। उम्मीद तो की जा रही थी कि कुशवाहा लीडर सम्राट चौधरी युवा हैं। पहले भी मंत्री रह चुके हैं। बड़े विभाग संभालने के काबिल हैं। चुनाव प्रचार में सबसे डिमांड वाले प्रचारक नेता भी रहे हैं। फिर भी ऐसा क्यों। क्या भाजपा के कुशवाहा पर जदयू की पूरी नजर है। क्या जदयू की पसंद का ही कुशवाहा, कुशवाहा लीडर है। क्या नीतीश कुमार फिर से उपेन्द्र कुशवाहा को बड़ा पद देकर जनता के बीच लव-कुश की जोड़ी को जिंदाबाद करने में लगे हैं। तो फिर भाजपा क्या कर रही है। राजद का क्या होगा। कांग्रेस को तो इसकी फिक्र ही नहीं। वहां तो ये सब सोचने की किसी को फुर्सत ही नहीं है। वहां सब खुद में ही बड़े लीडर हैं। कांग्रेस में सदानंद सिंह के अलावे कोई दिखता नहीं। राजद के पास भी आलोक मेहता जैसे दिग्गज लीडर हैं लेकिन राजद कभी कुशवाहा लीडर के तौर पर किसी को आगे नहीं कर पाया।


बचे खुचे कुछ नाम हैं जैसे नागमणि, भगवान सिंह कुशवाहा, रेणु कुशवाहा…ये सब अब आउट ऑफ मार्केट हो चले हैं। और सबके सब अलग-अलग खेमे में बिखरे पड़े हैं। ऐसे में यदि बिहार में कुशवाहा की राजनीति पर गौर करें तो भाजपा के पास युवा नेता सम्राट चौधरी और दूसरी ओर जदयू में अब उपेन्द्र कुशवाहा ही हैं जिनके बीच ये मुकाबला होगा कि किसका कद कितना बड़ा है। कौन कुशवाहा जाति के मास लीडर बनने का दमखम रखते हैं। फिलहाल, दोनों एनडीए खेमे के हिस्सा हैं। ऐसे में एनडीए के लिए दोनों हाथ में लड्डू ही है।


पटना से मौर्य न्यूज18 के लिए नयन की रिपोर्ट ।