बंगाल में चोट को वोट में बदलने का चल रहा खेल, जानिए क्या है ‘दीदी’ का मास्टर प्लान। Maurya News18

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मौर्य न्यूज18, कोलकाता

अतुल कुमार

राजनीति खेल सत्ता का, किसी ने ठीक ही कहा है…सियासत के भी कई रंग होते हैं। कभी विरोधी पार्टी की सरकार बनती है तो कभी सत्ता पक्ष ही दुबारा सरकार बनाने में कामयाब हो जाते हैं। लेकिन इस बार ममता दीदी को दुबारा सत्ता में आने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है। साम-दाम-दंड-भेद सब अपनाना पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव काफी रोमांचक हो गया है। पूरे देश के साथ ही विदेश के लोगों की भी नजर यहां के चुनाव पर है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सरकार में बने रहने के लिए लगातार रैलियां कर रही हैं। बीजेपी के रथ को रोकने के लिए इमोशनल कार्ड खेलने से भी परहेज नहीं कर रहीं। तृणमूल कांग्रेस के कई दिग्गज उनका साथ छोड़ चुके हैं। दो बार के टीएमसी विधायक जीतेंद्र तिवारी और विधाननगर मेयर इन काउंसिल देवाशीष ने तृणमूल कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया।

व्हील चेयर से रैली को संबोधित करतीं ममता बनर्जी

सबसे तगड़ा झटका दीदी को तब लगा जब पार्टी के दिग्गज और पूर्व मंत्री रहे शुभेंदु अधिकारी ने इस्तीफा दिया। इतना ही नहीं शुभेंदु नंदीग्राम से ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव में भी उतर गए हैं। इसके अलावे मुकुल रॉय, अर्जुन सिंह, दिनेश त्रिवेदी, सोवन चटर्जी और सौमित्र खान जैसे बड़े टीएमसी नेता भी दीदी का साथ छोड़ गए। अब सभी बागी नेता बीजेपी के खेमे से ममता को हराने की रणनीति बना रहे हैं।

नंदीग्राम से बीजेपी के उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी

पहले ममता बनर्जी ने बंगाली अस्मिता को भुंजाना चाहा। बीजेपी के नेताओं को बाहरी बताकर उनसे सावधान रहने की बात कही। फिर जय श्री राम के नारे को लेकर बीजेपी पर हमला किया। कहा- बीजेपी के नेता उन्माद फैलाना चाहते हैं। उन्होंने जय श्री राम की जगह जय सीया राम को चुना, केवल इसलिए कि जो बीजेपी बोलेगी, उसका उन्हें विरोध करना है।

हुगली में रैली को संबोधित करते हुए ममता ने आपा खो दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश का सबसे बड़ा दंगाबाज कह डाला। ममता ने कहा कि बंगाल पर बंगाल का शासन होगा। गुजरात का बंगाल पर शासन नहीं होगा। मोदी बंगाल पर राज नहीं करेंगे। गुंडे बंगाल पर शासन नहीं करेंगे।

ममता बनर्जी ने पूरी ताकत लगा दी है। बंगाल फतह को लेकर खेल रही हैं इमोशनल कार्ड। लोगों को सीधा कनेक्ट करने के लिए पैर के दर्द को बना रही हैं सहारा। सोमवार को उन्होंने पुरुलिया में व्हीलचेयर पर ही बैठकर लोगों को संबोधित किया। दो रैलियां कीं। 16 को बांकुड़ा और 17 को झारग्राम में भी उनकी रैली प्रस्तावित है।

इसके पहले नंदीग्राम में चोटिल होने के बाद रविवार को उन्होंने पहली बार कोलकाता में रोड शो किया था। लोगों को इमोशनली कनेक्ट करते हुए कहा, ‘भले ही मैं दर्द में हूं, लेकिन आप लोगों के सामने मेरा दर्द कुछ नहीं।’

कोलकाता में रोड शो के दौरान सीएम ममता बनर्जी

TMC के नेता से लेकर कार्यकर्ता तक यह कहते नजर आ रहे हैं कि एक तरफ BJP जैसी ताकतवर पार्टी है, जिसके पास संसाधन हैं, पैसा है। वहीं, दूसरी ओर एक अकेली महिला है, जो इन सब से लड़ रही है।

पहले भी हो चुका है इमोशनल कार्ड का खेला


बंगाल की राजनीति में यह पहली बार नहीं हो रहा कि ममता ने कोई इमोशनल कार्ड खेला हो। जब लेफ्ट सरकार थी, तब भी वे अक्सर ऐसा करते दिखी हैं। तब वे कहती थीं कि एक ओर वामपंथियों की ताकत है तो दूसरी ओर एक अकेली महिला है। इसका उन्हें फायदा भी मिला और 2011 में वे सत्ता में आ गईं।

क्या सहानुभूति के सहारे लगेगी नैया पार

हालांकि राजनीतिक पंडितों का कहना है कि पहले ममता विपक्ष में थीं। उनके साथ कोई सिक्योरिटी नहीं होती थी। वे जन आंदोलनों में शामिल होती थीं। इसलिए लोगों में उनके लिए सहानुभूति थी, लेकिन अब वे खुद सरकार में हैं। उनके पास सुरक्षा का कवच है। ऐसे में सहानुभूति से वे कितने वोट पा सकती हैं, यह वक्त बताएगा।

बंगाल की राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि चोटिल होने के बाद सहानुभूति वाले वोट इस बार ममता बनर्जी को नहीं मिल पाएंगे क्योंकि सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो गांव-गांव तक पहुंच चुके हैं। हर कोई यह जानता है कि ममता के साथ जो हुआ, वो हादसा था, हमला नहीं।

BJP ने भी झोंक दी है पूरी ताकत, हर हाल में चाहिए सत्ता

ममता बनर्जी की तीन रैलियों के बाद 18 मार्च को पुरुलिया में पीएम मोदी की रैली होने जा रही है। लोकसभा में BJP ने जंगलमहल में बड़ी जीत दर्ज की थी। पार्टी इस जीत को विधानसभा में बरकरार रखना चाहती है। इसलिए यहां अमित शाह और मोदी की रैलियां करवाई जा रही हैं। जंगलमहल में पहले दो चरणों में ही वोटिंग होनी है। इसलिए अब सभी पार्टियों का फोकस यहां है।

एक तरफ ममता जहां इमोशनल कार्ड खेल रही हैं तो वहीं BJP मुस्लिम तुष्टिकरण, तोलाबाजी, बेरोजगारी जैसे मुद्दे उठा रही है। ममता की चोट को भी नौटंकी बताया जा रहा है। BJP की कोशिश है कि पहले चरण की वोटिंग से पहले ही ममता के इस दांव को फीका कर दिया जाए। इसलिए पार्टी ने ममता की मेडिकल रिपोर्ट भी सार्वजनिक करने की मांग की है।

सांसदों पर बीजेपी खेल रही दांव, बाबुल को उतारा मैदान में

तृणमूल कांग्रेस लगातार दो बार से बंगाल की सत्ता पर काबिज है। इस बार हैट्रिक को लेकर ही ममता ने पूरा जोर लगा दिया है। 2011 में तृणमूल ने 184 सीटें जीती थीं, जबकि 2016 में उसके खाते में 211 सीटें आईं। हालात बदले और कांग्रेस व सीपीएम से टक्कर की जगह इस बार तृणमूल की सीधी लड़ाई बीजेपी से है। 2019 में लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जबरदस्त जीत मिली थी। बंगाल में बीजेपी के 18 सांसद हैं। हालांकि अबतक चार सांसदों को विधानसभा का उम्मीदवार बनाया गया है। इसमें सबसे प्रमुख नाम केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो का है।

बीजेपी सांसद बाबुल सुप्रियो

मुस्लिम वोटों पर है सबकी नजर

बंगाल में मुसलमानों की करीब 30 फीसदी आबादी है। टीएमसी और लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन में इन्हें साधने की होड़ लगी है। ऊपर से असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM की भी एंट्री हो चुकी है। कभी ममता के बेहद करीबी रहे पीरजादा का इस बार टीएमसी के खिलाफ ताल ठोकना दीदी की मुश्किलें बढ़ाने वाला है क्योंकि मुस्लिम वोटों में बिखराव हुआ तो सीधा फायदा बीजेपी को पहुंचेगा।

294 विधानसभा सीटों वाले पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में हैं। 46 विधानसभा सीटें तो ऐसी हैं जहां 50 प्रतिशत से भी ज्यादा मुसलमान हैं। 16 सीटें ऐसी हैं जहां इनकी तादाद 40 से 50 प्रतिशत के बीच है। 33 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 से 40 प्रतिशत और 50 सीटों पर 20 से 30 प्रतिशत है। इस तरह करीब 145 सीटों पर मुस्लिम वोटर जीत और हार तय करने में निर्णायक भूमिका में हैं। मालदा, मुर्शीदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर जिलों में मुस्लिम आबादी हिंदुओं से ज्यादा है। दक्षिण-24 परगना, नादिया और बीरभूम जिले में भी इनकी अच्छी-खासी आबादी है।

जगजाहिर है ममता का मुस्लिम प्रेम

पहली बार 2011 में सत्ता में आते ही ममता बनर्जी ने मुस्लिमों को रिझाने के लिए कई सौगातें दीं। मिसाल के तौर पर इमामों को 2500 रुपये मासिक भत्ता, मदरसों में पढ़ने वाली लड़कियों के लिए साइकिल, मुस्लिम बहुल जिलों में उर्दू को सेकंड लैंग्वेज का दर्जा और मुस्लिम ओबीसी को आरक्षण।

इतना ही नहीं, 2013 में उन्होंने कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए तसलीमा नसरीन के लिखे एक टीवी सीरियल पर भी बैन लगा दिया। यही वजह है कि बीजेपी उनकी सरकार पर ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ का आरोप लगाती है।