बेतिया के आतंक रूदल यादव को पुलिस ने कैसे मार गिराया, जानिए क्या है बिहार के सबसे बड़े ENCOUNTER का सच। Maurya News18

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80 के दशक की है कहानी, लच्छन यादव और भांगड़ यादव से भी दुर्दांत था रूदल यादव। बिहार सरकार ने उस पर इनाम भी घोषित कर रखा था।

बेतिया में आतंक की पाठशाला खोल रखी थी रूदल ने। उसका नाम सुनते ही दहशत में आ जाते सभी। 7 दिनों तक उसकी लाश देखने थाने में आते रहे थे लोग।

मौर्य न्यूज18, पटना

अतुल कुमार

बिहार के सबसे बड़े एनकाउंटर का सच…हम जानेंगे हर एक पहलू को स्टेप बाई स्टेप, जानेंगे कैसे बेतिया का दुर्दांत दस्यु रूदल यादव पुलिसिया मुठभेड़ में मारा जाता है। बता दें कि उस वक्त उसपर बिहार सरकार ने इनाम भी घोषित कर रखा था। 80 के दशक में बेतिया में लच्छन यादव, भांगड़ यादव और रूदल यादव की तूती बोलती थी। आतंक इतना कि नाम सुनते ही लोग दहशत में आ जाते।

बहरहाल 3 जून, 1983 की रात 11 बजे पुलिस और रूदल गैंग की ओर से गोलियां चलनी बंद हो जाती हैं।  तत्कालीन डीएसपी गिरिजानंदन शर्मा ने बताया कि  पुलिस की रणनीति थी कि किसी भी तरह बदमाशों को गन्ने के खेत से बाहर निकालना। ऐसा दिखावा किया गया कि पुलिस पीछे हट रही है ताकि वे सब गन्ने के खेत से बाहर निकल सकें। मुठभेड़ वाला इलाका जोगापट्टी थाना अंतर्गत था।

रूदल को जब यकीन हो चला कि पुलिस पीछे हट रही है तो वह खेत से निकलकर बगल के एक मकान में छिप जाता है। अगले दिन यानी 4 जून की सुबह गिरिजानंदन शर्मा को यह बात पता चलती है और वे मात्र एक सिपाही को लेकर ताकि किसी को शक न हो, छिपते-छिपाते उस मकान तक पहुंच जाते हैं।

पुलिसिया मुठभेड़ के दौरान रूदल गैंग के भी कई गुर्गे घायल हो गए थे। रूदल महज दो-तीन साथियों के सात ही अंदर छिपा था। तत्कालीन डीएसपी ने सभी को सरेंडर करने के लिए चेतावनी दी लेकिन वे लोग गोली चलाना शुरू कर देते हैं। पुलिस भी काउंटर करती है और अंतत: कुछ देर में रूदल तत्कालीन डीएसपी गिरिजानंदन शर्मा की रिवॉल्वर से निकली गोली से ढेर हो जाता है। वहीं कुख्यातों की ओर से चली गोली से दो जवान भी घायल हो जाते हैं।

रिटायर्ड IG गिरिजानंदन शर्मा ( पिंक कलर के शर्ट में) से बातचीत करते पत्रकार अतुल कुमार।

इस तरह पश्चिम चंपारण के एक दुर्दांत का खात्मा होता है और पुलिस से ज्यादा बेतिया के लोग राहत की सांस लेते हैं। रिटायर्ड आईजी गिरिजानंदन शर्मा ने बताया कि दुर्दांत की लाश को बेतिया थाने लाया जाता है। करीब सात दिनों तक उसकी लाश को देखने लोग थाने आते रहे। किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिस रूदल यादव ने अपने आतंक से पुलिस की नाक में दम कर रखा था, उसे उस वक्त का कद-काठी में हट्टा-कट्टा गबरू जवान-सा दिखने वाला डीएसपी अपनी रणनीति से ढेर कर देगा।

जानकार बताते हैं कि यह बिहार का पहला एनकाउंटर था जिसमें पुलिस की ओर से हैंड ग्रेनेड का इस्तेमाल किया गया था। लगभग 48 घंटे तक चली थी यह मुठभेड़।

तत्कालीन डीजीपी ज्ञानेंद्र नारायण ने गिरिजानंदन शर्मा की इस वीरता के लिए उन्हें गैलेंट्री अवार्ड देने की वकालत की थी। बिहार सरकार ने केंद्र सरकार के पास उनका नाम भी प्रस्तावित किया था लेकिन तकनीकी वजहों से यह अवार्ड उन्हें नहीं मिल पाया। हालांकि रिवॉर्ड के तौर पर उन्हें मुफ्त में एक रिवॉल्वर दिया गया, पूरी जिंदगी के लिए। पुलिस की वीरता के लिए यह पुरस्कार भी सरकार की ओर से दिया जाता है।

रिटायर्ड IG गिरिजानंदन शर्मा पन्नों से पुरानी यादों को निकालते हुए।

तत्कालीन जोनल आईजी विजयानंद पांडेय और एसपी यशवंत मल्होत्रा ने पुलिस की इस वीरता की भूरि-भूरि प्रशंसा की और तत्कालीन डीएसपी गिरिजानंदन शर्मा के अलावे टीम में शामिल सभी पुलिसकर्मियों की हौसलाअफजाई की। सही मायने में इस एनकाउंटर के बाद गिरिजानंदन शर्मा की पुलिस महकमे के साथ ही पूरे सूबे में एक कड़क पुलिस अफसर के रूप में  पहचान बनी।

रिटायर्ड IG गिरिजानंदन शर्मा से मौर्य न्यूज18 के विशेष संवाददाता अतुल कुमार की बातचीत पर आधारित एनकाउंटर की सच्ची कहानी।