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मिथिला : इस व्रत में महिला पंडित ही पूजा कराती हैं…जानिए ऐसे धार्मिक संस्कार ।

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मधुश्रावणी में व्रतियों को महिला पंडित न सिर्फ पूजा कराती हैं बल्कि कथा वाचन भी करती हैं इन्हें महिलाएं पंडित जी कहकर बुलाती भी हैं

कुमार गौरव, मौर्य न्यूज़ 18, पूर्णिया।

सखी हे, चलु मधुबन फूल पात लोढ़े लेल, आएल मधुश्रावणी अहिबात पूजय लए…

सखी हे, चलु मधुबन फूल पात लोढ़े लेल, आएल मधुश्रावणी अहिबात पूजय लए…इन दिनों मधुश्रावणी के इस गीत से गली मोहल्ला गूंज रहा है। पग पग पोखर, माछ मखान के लिए प्रसिद्ध मिथिला की प्राचीन जीवन पद्धति पूर्ण वैज्ञानिक है। यहां के पर्व त्योहारों का खासा वैज्ञानिक सरोकार है। प्रत्येक उत्सव में कुछ संदेश। कहीं प्राकृतिक प्रकोप से बचाव का संदेश देता श्रावण महीने की पंचमी पर नाग पंचमी हो या फिर नवविवाहितों का लोक पर्व मधुश्रावणी। इस लोकपर्व के बारे पंडित प्रेमनारायण ठाकुर (ग्राम-भूरी) कहते हैं कि श्रावण कृष्ण पंचमी (28 जुलाई से 11 अगस्त तक) से शुरू मधुश्रावणी मिथिलांचल का इकलौता ऐसा लोकपर्व है जिसमें पुरोहित महिला ही होती हैं। देश के किसी भी इलाके में शायद ही किसी पूजन का पौरोहित्य महिला करती हों।

मधुश्रावणी में व्रतियों को महिला पंडित न सिर्फ पूजा कराती हैं बल्कि कथा वाचन भी करती हैं। इन्हें महिलाएं पंडित जी कहकर बुलाती भी हैं। वैसे समय के साथ इन पंडित की खोज भी मुश्किल होती जा रही है। श्री ठाकुर ने कहा कि महिलाओं का इस पुरोहित्व से मनमोह कमतर होता जा रहा है। ऐसे में जो महिलाएं इस लोकपर्व को जिंदा रखने की जद्दोजहद में हैं उनकी पूछ जरूर मधुश्रावणी शुरू होते ही बढ़ जाती हैं। पंडितजी को वस्त्र व दक्षिणा देकर व्रती विधि विधान, परंपरानुसार अपना पंद्रह दिनी व्रत मनाती हैं। मिथिला में नवविवाहितों के लिए यह विशेष पर्व है।

पंद्रह दिनों तक उपवास रखकर दिन में फलाहार के बाद रात में ससुराल से आए अन्न से तैयार अरबा भोजन ग्रहण करतीं हैं। वहीं शाम ढलते ही नई दुल्हन की तरह सज संवरकर, नए परिधान धारण किए, नख सिख श्रृंगार कर घरों से सखियों संग हंसी ठिठोली करती हर दिन डाला लेकर निकलती हैं। वहीं पंडित जी की कथा मनोयोग से सुनना नहीं भूलती। मान्यतानुसार, पूर्व समापन दिन नवविवाहिता के पति फिर से सिंदूरदान करते हैं और विवाहिता के पैर में टेमी दागते हैं।

दाम्पत्य जीवन के अखंड सौभाग्य की करती हैं कामना


शहर के शांतिनगर, कोरटबाड़ी, मैथिल टोला समेत कई अन्य जगहों पर दाम्पत्य जीवन के अखंड सौभाग्य और पति के दीर्घायु होने की कामना को ले मिथिलांचल की नवविवाहिताओं का प्रमुख लोकपर्व मधुश्रावणी सावन की रिमझिम फुहारों के बीच बुधवार को नाग पंचमी से प्रारंभ हो गया। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से आरंभ होकर श्रावण शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि तक चलने वाले इस पर्व को लेकर नवविवाहिता के घरों में उत्सवी माहौल रहता है। पर्व के पहले दिन से ही मिथिलांचल के नवविवाहिताओं के घर में पारंपरिक, श्रृंगारिक एवं भक्ति गीतों से गुलजार हो गया है। नवविवाहिताओं के ससुराल से उनके लिए वस्त्र, अन्न, सहित गौड, हाथी, बिसहरा (नाग-नागिन) एवं साजो समान, श्रृंगार सामग्री पहुंच चुके हैं। घर की बुजुर्ग महिलाओं ने पूजा घर में बिसहरा सहित अन्य देवी देवताओं को स्थापित कर दिया है। मिथिलांचल के मैथिल ब्राह्मण एवं कर्ण कायस्थ, गंधवरिया राजपूत और वैश्यों की कुछ उपजातियों के लोगों के घरों में दाम्पत्य जीवन के अखंड सौभाग्य की कामना एवं पति के दीर्घायु होने को लेकर मनाया जाने वाला यह महापर्व मुख्य रूप से एक वर्ष के अंदर के विवाहितों द्वारा ही मनाया जाता है।

सखी हे, चलु मधुबन फूल पात लोढ़े लेल, आएल मधुश्रावणी अहिबात पूजय लए


सखी हे, चलु मधुबन फूल पात लोढ़े लेल, आएल मधुश्रावणी अहिबात पूजय लए…। नवविवाहिता सोलह श्रृंगार कर अपनी बहनों एवं सहेलियों के साथ इस गीत को गाते हुए प्रतिदिन विभिन्न बगीचों एवं विभिन्न देवी देवताओं के मंदिरों में जाकर पुष्प एवं डाली समेत पत्ता तोड़ते हुए दिख रही हैं व दूसरे दिन इसी से पूजा अर्चना करती हैं। लोकपर्व को लेकर रंग बिरंगे साड़ियों एवं परिधानों में सज धज कर नवविवाहिताओं का झुंड पुष्प एवं पत्ता लोढ़ने का काम शुरू कर चुकी हैं। श्रृंगार भाव से भरा यह पर्व नवविवाहिताओं को प्रकृति से समन्वय बनाने एवं पर्यावरणीय संतुलन से भी रूबरू कराता है। यह महापर्व श्रावण मास में इसलिए होता है क्योंकि इस मास में चारों तरफ हरियाली छाई रहती है और दाम्पत्य जीवन में भी हरियाली कायम रहे और महादेव व माता पार्वती का आशीर्वाद बना रहे इसलिए यही मास सबसे सर्वोत्तम माना गया है।

महिला सशक्तिकरण की बेजोड़ मिसाल

इस महापर्व के दौरान नव विवाहिताओं के साथ साथ उनके पूरे परिवार की दिनचर्या बदल जाती है। नवविवाहिता अपराजिता मिश्रा, कामिनी कुमारी, प्रीति, कोमल, अनुजा कहती हैं कि व्रत रखकर प्रत्येक दिन सुबह स्नान कर भगवान शिव के परिवार में शामिल भगवान महादेव, माता गौरी, बासुकी नाग-नागिन, चनाय पंचदेवता एवं नवग्रह और विषहरा की पूजा अराधना करती हैं। मधुश्रावणी की कथा भी सुनती हैं। पर्व में पुरूषों का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है। यहां तक की इस महापर्व में पुरोहित भी महिला ही होती है।

महिला पुरोहित प्रतिदिन महादेव पार्वती सहित कई अन्य शास्त्रीय कथा सुनाकर दाम्पत्य जीवन से जुड़ी विभिन्न पक्षों से अवगत कराती हैं। प्रतिदिन शाम में ससुराल से आए अरवा अरवाईन भोजन सामग्री (अन्न) से तैयार भोजन करती हैं। पूरे पर्व के दौरान नवविवाहिताओं के भोजन में नमक का प्रयोग निषेध है। लोकपर्व के मर्मज्ञ पंडित कामेश्वर झा (ग्राम – रामपुर) बताते हैं कि इस पर्व में नवविवाहिताओं को अपने दाम्पत्य जीवन को खुशहाल बनाने के लिए विभिन्न परिस्थितियों से सीख लेने का मौका भी मिलता है।

पर्व के अंतिम दिन श्रावण शुक्ल तृतिया को नवविवाहिता के पति का ससुराल में होना अनिवार्य है और इस दिन दोपहर बाद विधकरी द्वारा नवविवाहिता की पति की मौजूदगी में नवविवाहिता की पैर के घुटने में टेमी दागती है। टेमी दागने के समय नवविवाहिता का पति अपनी पत्नी की आंख पान के पत्ते से बंद कर देता है। टेमी दागने से घुटने पर होने वाले फोका और असहनीय दर्द को लेकर अब इसमें भी परिवर्तन हो रहा है।

आधुनिकता के प्रभाव वाले घरों में टेमी दागने के बदले चंदन लगाया जाता है। मान्यता है कि जिस नवविवाहिता को जितना बड़ा फोका निकलेगा, उसका सुहाग उतना मजबूत होगा। महिला पंडित को अंतिम दिन दक्षिणा के रूप में अन्न, वस्त्र एवं रूपए भेंट करने की परंपरा है। विश्व स्तर पर महिला सशक्तिकरण की आज बात की जा रही है लेकिन मिथिला में महिला हमेशा सशक्त रही हैं।

पूर्णिया से मौर्य न्यूज़ 18 के लिए कुमार गौरव की रिपोर्ट…।

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