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POLITICS : कटना तो तरबूज को ही है..!

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Cutting is only for watermelon..!

आज से मानसून सत्र शुरू । लोकसभा ।

निशिकांत ठाकुर, नई दिल्ली ।

ऐसे कई उदाहरण हैं कि जब किसी को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया गया तो उनके पक्षकार जोर-जोर से आवाज लगाते हैं कि यह गलत हुआ। लेकिन, ऐसे तथाकथित पूर्व मंत्रियों की पोल अब धीरे-धीरे खुलने लगी है कि सरकार में रहते उन्होंने कितना अ’वैध’ कार्य किया। एनडीए—एक की सरकार में मंत्री रहे राजीव प्रताप रूडी की पोल अभी कुछ दिन पहले बिहार के ही एक पूर्व सांसद पप्पू यादव ने सारण (छपरा) में उनके आवास पर दर्जनों एंबुलेंस को देखकर प्रेस कांफ्रेंस करके खोल दी। काफी शोर मचा, खूब हो-हल्ला मचाया गया, लेकिन कोई कार्रवाई इसलिए नहीं हुई, क्योंकि वह सत्तारूढ़ दल के अभी भी ‘पहुंच’ वाले सांसद हैं।

व्यक्तिगत रूप से अच्छा होना और सरकार में मंत्रालय चलाना दो अलग-अलग बातें हैं ।

गिनती के कुछ पैमाने जिसके जरिए कुछ तो साफ हो गए , कुछ माफ हो गए और कुछ आगे बढ़ गए

बड़बोलापन ।
कठोर रवैया ।
नकारापन ।
असाध्य रोग ।
कड़वी दवा का डोज ।

व्यक्तिगत रूप से अच्छा होना और सरकार के साथ कदमताल करके गंभीरता से अपने मंत्रालय की जिम्मेदारी को अंजाम देना अलग-अलग बातें हैं। जिन लोगों को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया गया, उनमें कई से मेरे अच्छे संबंध हैं, लेकिन यह भी सच है कि बड़बोलेपन, जनता के प्रति कठोर रवैये और नकारेपन के कारण ही उन लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है। कहा जाता है कि असाध्य बीमारी को खत्म करने के लिए कड़वी दवा देनी ही पड़ती है। इस मंत्रिमंडल के विस्तार का एक कारण यह भी हो सकता है। वैसे, बड़बोले लोगों को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाना दूसरी बात है। कुछ अच्छे युवाओं और उत्साही को पदोन्नत करके और अपने मंत्रिमंडल में शामिल करके सरकार ने दूरदृष्टा होने का प्रमाण भी दिया है। उदाहरण के लिए हमीरपुर (हिमाचल) के सांसद अनुराग ठाकुर को पदोन्नत किया गया और ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने कैबिनेट मंत्रिमंडल में लेना युवा शक्ति को प्रभावित करेगा, उनके मनोबल को बढ़ाएगा।

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केन्द्रीय मंत्रीमंडल में किन-किन पर आपराधिक केस ।

समाचार पत्रों में छपी खबरों और चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले समूह एडीआर व गुगल को खंगालने से उपलब्ध एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय मंत्रिमंडल के 78 मंत्रियों में से 42 प्रतिशत ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने की घोषणा की है। इनमें से चार पर हत्या के प्रयास से संबंधित मामले भी हैं। 15 नए कैबिनेट मंत्रियों और 28 राज्य मंत्रियों ने पिछले सप्ताह बुधवार को शपथ ली। इसके बाद मंत्री परिषद के कुल सदस्यों की संख्या 78 हो गई। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने चुनावी हलफनामों का हवाला देते हुए कहा कि इन सभी मंत्रियों के किए गए विश्लेषण में 42 प्रतिशत (33) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले होने का उल्लेख किया है। करीब 24, यानी 31 प्रतिशत मंत्रियों ने हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती आदि समेत गंभीर आपराधिक मामलों की घोषणा की है।

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केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री निशिथ प्रमाणिक पर है हत्या मामले में केस। खुद हलफानामे में जिक्र किया ।

गृह राज्यमंत्री निशिथ प्रमाणिक, केन्द्रीय मंत्रीमडल के नये सदस्य । बंगाल से बीजेपी सांसद हैं ।

गृह राज्य मंत्री बने कूच बिहार निर्वाचन क्षेत्र के निशिथ प्रमाणिक ने अपने खिलाफ हत्या से जुड़े एक मामले की घोषणा की है। वह 35 वर्ष के मंत्री परिषद के सबसे युवा चेहरे भी हैं, उन्हें गृह राज्यमंत्री बनाया गया है। चार मंत्रियों- जॉन बारला, निशिथ प्रमाणिक, पंकज चौधरी और वी. मुरलीधरन ने हत्या के प्रयास से जुड़े मामलों की घोषणा की है। इसके अलावा, रिपोर्ट में जिन मंत्रियों का विश्लेषण किया गया, उनमें से 70 (90 प्रतिशत) करोड़पति हैं। प्रति मंत्री औसत संपत्ति 16.24 करोड़ रुपये है। चार मंत्रियों- ज्योतिरादित्य सिंधिया, पीयूष गोयल, नारायण तातु राणे और राजीव चंद्रशेखर ने 50 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति का उल्लेख किया है। आठ मंत्रियों- प्रतिमा भौमिक, जॉन बारला, कैलाश चौधरी, बिश्वेश्वर टूडु, वी. मुरालीधरन, रामेश्वर तेली, शांतनु ठाकुर एवं निशिथ प्रमाणिक ने अपनी संपत्ति एक करोड़ रुपये से कम घोषित की है। इनमें प्रतिमा भौमिक के पास सबसे कम छह लाख रुपये मूल्य की संपत्ति है।

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और…अंत में अगर आम लोगों की मानें तो /

उनका साफ शब्दों में यह कहना है कि शीर्ष नेतृत्व ने अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए कुछ योग्य मंत्रियों को बलि का बकरा बना दिया, ताकि लोगों के संज्ञान में यह बात आए कि अयोग्य मंत्रियों से इस्तीफा लेकर उन्हें दुनिया की नजरों में ‘नंगा’ कर दिया। कई राजनीतिज्ञों ने तो उदाहरण देते हुए कहा है कि डॉ. हर्षवर्धन, रविशंकर प्रसाद…इन दोनों के हटने पर आश्चर्यचकित हूं। ऐसे योग्य और अपने काम को अच्छी तरह से जानकर उसे संपन्न कराने वालों को अयोग्य करार देकर सरकार ने अच्छा नहीं किया। हो सकता है, इन्हें संगठन की कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जाए, पर यह कहने और भरोसा दिलाने की बात है। इनके साथ क्या होगा या क्या सलूक किया जाएगा, यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन हां, जैसा कि ऊपर ही कहा जा चुका है कि नेतृत्व देने वाले की नजर हर उस पर होती है, जिसके कंधे पर कार्य को बेहतर तरीके से अंजाम देने का दायित्व उसने सौंप रखा है। अब देखना यह है कि जिन्हें अब जंबो मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, वह देश के विकास में अपना कितना योगदान दे पाते हैं और देश के समक्ष जो चुनौती है, उससे कैसे निपटते हैं। अभी से उस पर टीका टिप्पणी करना उचित नहीं। कुछ वक्त इंतजार कीजिए, सिर के बाल सामने ही गिरेंगे…।

नई दिल्ली से मौर्य न्यूज18 की पॉलिटिकल गेस्ट रिपोर्ट ।

mauryanews18
MAURYA NEWS18 DESK

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