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देश का पहला मॉब लिंचिंग, जिसमें सिर्फ एक राजनेता को मिली फांसी की सजा

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14 वर्षों की सजा पूरी हो चुकी है .

आनंद मोहन की रिहाई की प्रक्रिया शुरु

15 अगस्त से पहले ही होगी आनंद मोहन की रिहाई

मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार।

पटना (बिहार)

बिहार, एक ऐसा राज्य, जहां से वृहत्तर ज्ञान पुंज को बड़ा फलक हासिल हुआ है। गौरतलब है कि बिहार से ही अहिंसा की अवधारणा उत्पन्न हुई है। सम्पूर्ण मानव जाति की भलाई के लिए इतिहास का सबसे आकर्षक और प्रभावकारी विचार, यहीं की देन है। यहीं से गौतम बुद्ध और भगवान महावीर ने 2600 साल पहले अहिंसा की अवधारणा को स्थापित और विकसित किया था। लेकिन दुर्भाग्य और बड़ी विडंबना देखिए कि इस सूबे के लोग कभी भी अहिंसा के महत्त्व को नहीं समझ सके और देखते ही देखते बिहार एक ऐसा राज्य बन गया, जहां विकास कम और बाहुबली नेताओं का उदय ज्यादा देखा गया। साक्ष्य गवाह हैं कि बरसों से ना जाने कितने ही बाहुबली, बिहार की मिट्टी को खून से लाल करते आए हैं।

बिहार के ऐसे लाल जो अपनी भूमि को ही खून से लाल करते रहे …।

  1. अनंत सिंह,
  2. सूरजभान सिंह,
  3. सुनील पांडेय,
  4. छोटन शुक्ला,
  5. मुन्ना शुक्ला,
  6. बिंदु सिंह,
  7. दिवंगत मो शाहबुद्दीन
  8. और रामा सिंह
Rama Singh with Rjd Leader Tejashwi Yadav .

जैसे बाहुबली नेताओं के नाम से आज भी बिहार के लोग सिहर और काँप जाते हैं। इन्हीं बाहुबलियों के बीच एक और बड़ा नाम और गिना जाता है, वो नाम है पूर्व सांसद आनंद मोहन सिंह का। हालांकि पूर्व सांसद आनंद मोहन को बाहुबली होने का तमगा, उनके विरोधी राजनेताओं के इशारे पर, पूर्व के मीडिया घराने ने दिया है।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति की उपज पूर्व सांसद आनंद मोहन ने 17 साल की उम्र में ही सियासत की शुरुआत कर दी थी। सच यह है कि आनंद मोहन की विरासत, एक बड़े स्वतंत्रता सेनानी का परिवार रहा है। पूर्व सांसद आनंद मोहन के दादा राम बहादुर सिंह से मिलने महात्मा गांधी, उनके पैतृक गांव, बिहार के सहरसा जिले के पंचगछिया गांव आये थे। उस समय स्वतंत्रता सेनानी राम बहादुर सिंह और उनकी पत्नी ने घर के सारे आभूषण और नकदी, आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी को सौंप दिए थे।

आजाद भारत के पहले ऐसे राजनेता …।

ये आजाद भारत के पहले ऐसे राजनेता हैं, जिन्हें मॉब लिंचिंग के मामले में अकेले ही फांसी की सजा सुनाई गई। हालांकि, इस सजा को बाद में माननीय सुप्रीमकोर्ट ने उम्र कैद में बदल दिया। इसी आजीवन कारावास की सजा के तहत आनंद मोहन, आज तक जेल की सलाखों के पीछे हैं।

क्रांतिकारी को बाहुबली बताने की साजिश


आनंद मोहन, जेपी आंदोलन की उपज रहे हैं। जिस समय आनंद मोहन इंटर के छात्र थे, उसी समय पूरे देश में जेपी का सम्पूर्ण क्रांति के नारे के साथ बड़ा आंदोलन हुआ। इस आंदोलन में आनंद मोहन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नतीजतन, वे जेल गए और उनके आगे की पढ़ाई भी छूट गई। यहीं से, समाज और व्यवस्था बदलने का जिगर में ज्वाल लिए आनंद मोहन राजनीति में कूद पड़े। युवावस्था में ही जिद और जुनून की राजनीति शुरू करने वाले आनंद मोहन पर कई संगीन मुकदमे भी दर्ज हुए।

एक मामले में उन पर शूट वारंट भी जारी हुआ। इस मामले में इन्होंने, 1983 में सहरसा के पटेल मैदान में बिहार के छोटे साहब कहे जाने वाले सत्येंद्र नारायण सिंह के सामने मंच पर आत्मसमर्पण किया।

एक अंग्रेजी अखबार के नामी पत्रकार की अहम भूमिका …

इस आत्मसमर्पण में दिवंगत उमेश प्रसाद सिंह, जो यूनिवर्सिटी प्रोफेसर और अंग्रेजी के ख्यातिलब्ध पत्रकार थे, उनकी अहम भूमिका थी। लोगों का कहना है कि बिहार के सहरसा जिला मुख्यालय के पटेल मैदान से ले नया बाजार, जिला स्कूल वाली सड़क सहित सभी मार्गों पर 20 लाख से अधिक आनंद मोहन के समर्थक जमा हुए थे।

बीबीसी पर समाचार आया था कि ऐसी भीड़ किसी रॉबिन हुड के लिए ही जमा हो सकती है। उस दौरान कुछ सालों तक आनंद मोहन सहरसा जेल में रहे। 1990 के दशक में राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव का अभ्युदय हुआ। यह वह दौर था, जिसमें जातीय संघर्ष की खूनी पटकथा लिखी गई।

जब पप्पू यादव ने ब्राह्मण और राजपूत को निशाना बनाना शुरू किया…फिर क्या हुआ

पप्पू यादव ने ब्राह्मण और राजपूत जाति के लोगों को निशाना बनाना शुरू किया। आनंद मोहन ने इसका जम कर प्रतिकार किया, जिसमें दोनों पक्षों के कई लोग मारे गए। पप्पू यादव को लालू प्रसाद यादव का आशीर्वाद प्राप्त था। आनंद मोहन के टेरर से कोसी और सीमांचल में कभी भी, किसी बड़ी घटना का अंदेशा लगा रहता था। लेकिन कई लोगों की जान जाने के बाद, आनंद मोहन और पप्पू यादव के बीच होने वाले खूनी खेल को लगाम लगा।

1994 में एक मामला ऐसा आया, जिसने ना सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश को हिला कर रख दिया। दरअसल, जिस समय आनंद मोहन की राजनीति चरम पर थी, उस समय बिहार के मुजफ्फरपुर में बाहुबली नेता छोटन शुक्ला का राज चलता था। जानकारों की मानें तो, आनंद मोहन और छोटन शुक्ला के बीच गहरी दोस्ती थी । (क्रमश:)

आगे एपीसोड में आप जान पाएंगे छोटन शुक्ला की हत्या कब और कैसे हुई । आंदन मोहन कैसे डीएम हत्या की घटना के मेनविलेन बने ।

आपने रिपोर्ट लिखी है …।

MUKESH KUMAR SINGH, SR JOURNALIST, PATNA, BIHAR

मौर्य न्यूज18 की विशेष रिपोर्ट ।

KUMAR GAURAVhttp://www.mauryanews18.com
Bureau Correspondent Purnea, Simanchal, Bihar

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