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बिहार में पंचायत चुनाव नहीं तो विकल्प की तैयारी ! जनप्रतिनिधों की होगी बल्ले-बल्ले। Maurya News18

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नयन, पटना, मौर्य न्यूज18

बिहार में पंचायत चुनाव कोरोना के नाम चढ़ चुका है । बिहार के पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी भी साफ कर चुके हैं कि जान की कीमत पर चुनाव नहीं कराया जा सकता । सो, ये तय मानिए सरकार ये फैसला कर चुकी है कि कोरोना कि स्थिति को देखते हुए ही चुनाव होंगे। अब चाहे ये लंबी खींचे या जो भी हो । कोराना संकट सबसे पहले । ऐसी स्थिति में चुनाव की बात सोंचना ही बेमानी है फिलहाल …तो सवाल है फिर क्या होगा….तो समझलीजिए …पंचायती राज संस्थाओं के वर्तमान प्रतिनिधियों की बल्ले-बल्ले होने वाली है । कैसे …। इसके लिए पढ़िए पूरी रिपोर्ट ।

वर्तमान वस्तुस्थिति को समझिए ….


इन दिनों पूरे देश को कोरोना ने चपेट में ले रखा है । हाल ही में बंगाल में विधानसभा चुनाव हुए । केन्द्र सरकार और चुनाव आयोग की फजीहत हुई । उत्तर प्रदेश में कुछ इलाकों में पंचायत चुनाव हुए….काफी फजीहत हुई…कोर्ट ने एक्शन लिया और चुनाव आयोग की सिट्टी-पट्टी गुम हो गई । अब बिहार के सामने भी पंचायत चुनाव सिर पर है लेकिन यहां की सरकार ने साफ कर दिया कि ना बाबा ना चुनाव नहीं कराएंगे …कोरोना आया हुआ है । पहले जान बचाएंगे फिर चुनाव होगा । स्पष्ट है कि अब इसके विकल्प पर विचार होना है । चुनाव नहीं हुए तो क्या होगा । इसे बहुत तरीके से समझिए ।


ये कोई पहला राज्य नहीं हैं जहां इस तरह की संकट आई है । ये संकट बिहार के पड़ोसी राज्य झारखंड के सामने भी उत्पन्न हुए ….फिर वहां विकल्प तलाशा गया ।


जहां पंचायत चुनाव समय पर नहीं हुए वहां विकल्प में क्या हुआ ..समझने के लिए चलिए पड़ोसी राज्य झारखंड


बिहार के पड़ोसी झारखंड में भी त्रिस्तरीय पंचायत पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पिछले साल समाप्त हो गया। कोरोना के चलते चुनाव नहीं हुए। झारखंड के पंचायती राज अधिनियम में पहले से प्रावधान है। इसलिए इस साल सात जनवरी को एक अधिसूचना के जरिए पुराने निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही अधिकार दे दिया गया। इसके तहत विघटित पंचायत के मुखिया को कार्यकारी समिति का प्रधान बना दिया गया। पंचायत समिति के अध्यक्ष का नाम प्रखंड प्रमुख होता है। झारखंड में इसे प्रधान, कार्यकारी समिति, पंचायत समिति कर दिया गया। इसी तरह जिला परिषद के अध्यक्ष को प्रधान, कार्यकारी समिति, जिला परिषद नामित किया गया। इन सभी संस्थाओं में सरकारी प्रतिनिधि के तौर पर पहले की व्यवस्था कायम रखी गई है। झारखंड में नई व्यवस्था का कार्यकाल अधिकतम छह महीना रखा गया है।


यदि ये विकल्प चुनाव गया तो बिहार में स्थिति क्या होगी ….

अब एक के बदले दो विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। दूसरे विकल्प पर अगर फैसला हुआ तो विघटित पंचायती संस्थाओं का अधिकार निवर्तमान प्रतिनिधियों को मिल जाएगा। वे अगले चुनाव तक बदले हुए पदनाम से काम करते रहेंगे। यानि वर्तमान में जो जनप्रतिनिधि हैं उनकी बल्ले-बल्ले रहेगी । वो शासन में बने रहेंगे । गद्दी कायम रहेगी ।


बिहार में पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल कब समाप्त हो रहा ….

आपको जानकारी के लिए बता दें कि राज्य की पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल 15 जून को समाप्त हो रहा है । संक्रमण की व्यापकता को देखते हुए समय पर चुनाव होने की संभावना पूरी तरह क्षीण हो गई है। विधानसभा चुनाव कराने के चलते मद्रास हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग की तीखी आलोचना की थी। ऐसी ही आलोचना उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत चुनाव को लेकर शुरू हो गई है। यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रकोप के लिए वहां हुए पंचायत चुनाव को भी जिम्मेवार माना जा रहा है।


संवैधानिक व्यवस्था क्या है… इसे भी समझ लीजिए …

अगर हम पंचायती राज संस्थाओं के संवैधानिक नियम-कानून को समझें तो अधिनियम में नहीं है प्रावधान यानि राज्य का पंचायती अधिनियम इस स्थिति से निबटने का उपाय नहीं बता रहा है कि किसी कारणवश पंचायतों के चुनाव समय पर नहीं हुए तो संस्थाएं किसके मातहत काम करेंगी । नगर निकायों से जुड़े अधिनियम में संशोधन के बाद ऐसी स्थिति में प्रशासक की व्यवस्था की गई है। उसी तर्ज पर पंचायती राज संस्थाओं को भी चुनाव तक प्रशासक के हवाले करने पर विचार किया जा रहा था। लेकिन, अब दूसरे विकल्प पर भी सोचा जा रहा है।


बिहार में दलीय स्तर पर चुनाव की मांग उठी है….


आपको अब तक यही पता है कि बिहार में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव दलीय आधार पर होते नहीं हैं । लेकिन इस बार जैसी की पूरी हवा बनी थी कि चुनाव दलीय आधार पर हो । इसमें कमोवेश सभी दलों की राजमंदी भी दिख रही थी । विरोध भी हुए । लेकिन एकमत बनती दिख रही थी । वैसे इस बात के लिए पूरी तैयारी सभी दलों को मानसिक रूप से करनी होती है । दलीय चुनाव के अपने हिसाब-किताब हैं । इसका विशेलेषण सभी दल कर रहे हैं । लेकिन सत्ताधारी दल इस बात को तैयारी में लगती दिख रही थी । खैर, ये है कि बिहार में पंचायती राज संस्थाओं का चुनाव दलीय आधार पर नहीं होता है। लेकिन, अधिसंख्य प्रतिनिधि किसी न किसी दल से जुड़े ही होते हैं। ये प्रतिनिधि अपने प्रदेश नेतृत्व पर दबाव बना रहे हैं कि निर्वाचित संस्थाओं को अफसरों के हाथ में जाने से बचाया जाए। भाकपा ने बिहार के मुख्यमंत्री से राज्य में झारखंड जैसी व्यवस्था लागू करने की मांग की है। संभव है कि जल्द ही अन्य दलों से भी ऐसी मांग उठे। यदि उठते हैं तो सरकार इस पर क्या विचार करती है ये देखना होगा । लेकिन जो स्थिति बनी हुई है सरकार विकल्प पर विचार करेगी ही करेगी ।


बिहार के पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी क्या कह रहे हैं …।


बिहार के पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी स्पष्ट कर चुके हैं कि कोरोना संकट में पंचायत चुनाव से पहले जनता की जान बचाना प्राथमिकता है । रही बात समय पर चुनाव नहीं होने की स्थिति में क्या करेगी सरकार । तो फिलहाल इस पर कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी । समय पर नहीं चुनाव होने के बाद संवैधानिक व्यवस्था क्या-क्या है सभी विकल्पों पर विचार करने के बाद स्थित स्पष्ट कर दी जाएगी । वैसे, स्थिति को देखते हुए सरकार विकल्प पर भी अध्ययन कर रही है । इससे इनकार नहीं किया जा सकता ।


आखिरी में ये भी समझिए…।

बिहार में पंचायत चुनाव को लेकर पल-पल की खबर जनता जानने को उत्सुक रहती है । बिहार में गांव की अपनी राजनीति है । गांवों के विकास में पंचायती राज संस्थाओं की बड़ी भूमिका रहती है । ये चुनाव विधान सभा चुनाव या लोक सभा चुनाव से भी ज्यादा सरगर्मियों के साथ होती है । एक-एक जनता इसमें सम्मिलित रहती है । राजनीति की छोटी इकाई के इस चुनाव को लेकर बिहार में कोरोना संकट पार्ट-2 आने से पहले काफी माहौल बनता जा रहा था । इसी बीच चुनाव आयोग में ईवीएम का मामला फंसा । फंसते-फंसते जबतक वो सुलझा …कोरोना संक्रमण ने सबको चपेटे में ले लिया ….ऐसे में जो भी इस चुनाव में मैदानी जंग आजमाने की अंदर ही अंदर प्लानिंग कर रहे थे सबके अंदर निराशा छा गई । संकट आने के बाद भी सबकी नज़र पंचायत चुनाव को लेकर अब भी बनी हुई है । गांवों में कस्बों में इसपर चर्चा होती ही होती है । ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि आगे-आगे होता है क्या । फिलहाल तो जो जनप्रतिनिधि हैं उनके राहत भरी खबर तो है ही ।


पटना से मौर्य न्यूज18 के लिए नयन की रिपोर्ट ।

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