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बिहारी में माय दिवस …!

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गेस्ट स्पेशल- मां दिवस पर खास

फेसबुक वॉल से मनोज मीता का लेख –

पढ़ने योग्य गंभीर लेख है ! जरूर पढ़ें ! लेखक ने अपनी बातें रखी हैं। पर सबको छू जाने वाली लेख है। मौर्य न्यूज18 ने इसलिए इसे अपने वेवसाइट पर स्थान देने से नहीं रोक सका।

अब तो मैगी है, पश्ता है, ब्रेड बटर है, हमरे जैसे घुमनी और पराठा कहां । उसके बाद बच्चा का बैग है, जूता चका चक चाहिए, ड्रेस है टाई है, सलीके से सब है । हमारा क्या था, न बैग था, न ड्रेस था और न चकाचक जुत्ता था । पैंट – बुशर्ट था, टीना का बॉक्स था और हवाई चप्पल था । जाने को कोई बस स्टॉप नहीं था, जहां आज की मम्मी जाती है छोड़ने और लाने, हम तो अपने मर्जी के थे कभी पैदल तो कभी रिक्सा के पीछे लटके स्कूल पहुंचते थे, दोपहर के टिफिन में भी भागे भागे घर, यहां माय सुंदर दाल भात तरकारी खिलाती थी, अब तो बच्चों को खिलाना, पाकिस्तान पे एयर स्ट्राइक करने जैसा है । हमलोग का छुट्टी हुआ तो सीधे घर घुसे और जो माय दिया उस पे टूट पड़े खाने और भागे खेलने, अब लौट ते बच्चो को tiusan भेजना है, पहुंचना भी है । मम्मी लोगो को ये भी है,माय को क्या था , शाम को अंधेरा होने को होता तो लौटता, गोड – हाथ धोता और माय के साथ ही बैठता, पढ़ने । उधर माय खाना बना रही है और इधर हम कौपी किताब पल्ट रहें है । पढ़ खक रहे है, माय की कहानी सुन रहे है, राक्षस वाला । और कहानी ख़तम पढ़ाई खत्म, अब खाओ और सो जाओ, पर अब बच्चा लौटा, मम्मी की कहानी शुरू, क्यों की बच्चा कहीं खेलने नहीं जाए गा, वो टीवी के सामने बैठे गा या पापा का मोबाइल चलाए गा, और रात के 10 – 11 तक मम्मी के साथ चख चख ।

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आंख खराब हो जाए गा, होमवर्क करो, मार लगे गी, बच्चे के सोने के बाद उसके रूटीन के हिसाब से बैग सजना । हम कहीं एग्जाम देने जाते थे, तो कपड़े का बैग हो न हो एक बड़का थैला खाने को होता था । उसमे चूड़ा का भुजा, चनाचुर, अब के बच्चे को पता भी नहीं होगा कि ये चनाचुर क्या होता है । जिसे तुम दालमोट कहते हो वो घरे में माय बनती थी । साथ में ठेकुआ – पिरकिया और नमकीन जैसे हम परीक्षा देने नहीं नौकरी करने जा रहें है । और ये भी बता दें कि गंतव्य पहुंचने से पहले हम उस सारे नाश्ते की खा लेते थे, अब तो कैंपस सलेक्सन है, एग्जाम का झंझटे ख़तम, अब बच्चा नौकरी करने जाता है, सीधे पढ़ाई के बाद, कोई निमकी, पिरकिया और ठेकुआ नहीं लेता और अगर मम्मी बना के देती भी है तो लेने से इंकार करता है । ऐसी होती है माय और मम्मी ।

हमारा लोग का तो सुबह से शाम मदर्स डे था, पर अब के परिवेश में साल में एक बार है मदर्स डे । माय आप हमेशा यादों में हो और आज की मम्मी भी आप के यादों में रहे इन्हीं कामना के साथ ।

https://www.facebook.com/manoj.dishagvm/posts/2143309635765761

लेखक परिचय।



मनोज मीता !
सचिव। दिशा ग्रामीण विकास मंच।
भागलपुर के निवासी। गांधीवादी। सामाजिक कार्यकर्ता। और जनसरोकार के लिए सदैव कार्य करते रहने के लिए आमजनों में सादर आदरणीय




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