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एक फौजी ऐसा है – जो मौत के बाद भी करता है ड्यूटी- भारत-चीन सीमा

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बाबा हरभजन सिंह के नाम से बना है मंदिर

भारत-चीन बॉर्डर गंगटोक से मनोरंजन सहाय की रिपोर्ट, मौर्य न्यूज18

मौत के बाद भी कोई ड्यूटी करता है क्या। अगर करता है तो ये अद्भूत आश्चचर्य को जरूर जाना-समझा जाना चाहिए। अगर ऐसा है तो आखिर क्या सच्चाई है। क्यों ऐसी बातें कहीं जा रही हैं। इसी सच्चाई को जाना है हमारे मौर्य न्यूज18 के सफर की रिपोर्ट में मनोरंजन सहाय ने।

सिक्किम के दौरे पर सहाय जब गंगटोक स्थित भारत-चीन सीमा पहुंचे तो ऐसी ही एक अद्भूत कहानी सुनी। रूची बढ़ी तो उस स्थल को गए। वहां तक पहुंचे औऱ तमाज फौजी की मौत से बाद भी ड्यूटी की कहानी की सच्चाई जानने में जुट गए। फिर क्या था देखा वहां एक मंदिर जहां उस फौजी पूजा होती है। और मान्यताएं सौ फीसदी कायम है। वहां के फौजियों से इस सच्चाई को जाना तो दंग रह गए। क्या है पूरी स्टोरी आप भी जानिए।

सीमा पर पहुंचकर मनोरंजन सहाय ने जो जाना-समझा, वो पढिए…

मौर्य न्यूज18 संवाददाता मनोरंजन सहाय – सिक्किम स्थित भारत-चीन सीमा पर
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बाबा की मृत्यु 1968 में ही हो गई थी, लेकिन लोग कहते हैं कि बाबा आज भी अपनी ड्यूटी करते हैं । आप चाहे इस पर यकीन करे या ना करे पर खुद चीनी सैनिक भी इस पर विश्वास करते है इसलिए भारत और चीन के बीच होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में हरभजन सिंह के नाम की एक खाली कुर्सी लगाईं जाती है ताकि वो मीटिंग अटेंड कर सके।

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पहले फौजी हरभजन सिंह को जानिए

हरभजन सिंह का जन्म 30 अगस्त 1946 को, जिला गुजरावाला जो कि वर्तमान में पाकिस्तान में है, हुआ था । हरभजन सिंह 24 वि पंजाब रेजिमेंट के जवान थे जो की 1966 में आर्मी में भारत हुए थे। पर मात्र 2 साल की नौकरी करके 1968 में, सिक्किम में, एक दुर्घटना में मारे गए।

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मौत के बाद शव कैसे मिला, काफी रोचक वाक्या है !


हुआ यूं की एक दिन जब वो खच्चर पर बैठ कर नदी पार कर रहे थे तो खच्चर सहित नदी में बह गए। नदी में बह कर उनका शव काफी आगे निकल गया।  दो दिन की तलाशी के बाद भी जब उनका शव नहीं मिला तो उन्होंने खुद अपने एक साथी सैनिक के सपने में आकर अपनी शव की जगह बताई।
सवेरे सैनिकों ने बताई गई जगह से हरभजन का शव बरामद  अंतिम संस्कार किया। हरभजन सिंह के इस चमत्कार के बाद साथी सैनिको की उनमे आस्था बढ़ गई और उन्होंने उनके बंकर को एक मंदिर का रूप दे दिया,  जो की ‘बाबा हरभजन सिंह मंदिर’ के नाम से जाना जाता है।  
यह मंदिर गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच, 13000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्तिथ है। यहाँ सैलानी आतें हैं लेकिन वास्तविक पुराना बंकर वाला मंदिर इससे 1000 फ़ीट ज्यादा ऊंचाई पर स्तिथ है। मंदिर के अंदर बाबा हरभजन सिंह की एक फोटो और उनका सामान रखा है।


अब भी करते हैं ड्यूटी, मिलता है वेतन

बाबा हरभजन सिंह अपनी मृत्यु के बाद से लगातार ही अपनी ड्यूटी देते आ रहे है।  इनके लिए उन्हें बाकायदा तनख्वाह भी दी जाती है, उनकी सेना में एक रैंक है, नियमानुसार उनका प्रमोशन भी किया जाता है। 
यहां तक की उन्हें कुछ साल पहले तक 2  महीने की छुट्टी पर गाँव भी भेजा जाता था।  इसके लिए ट्रैन में सीट रिज़र्व की जाती थी, तीन सैनिको के साथ उनका सारा सामान उनके गाँव भेजा जाता था तथा दो महीने पुरे होने पर फिर वापस सिक्किम लाया जाता था। 
जिन दो महीने बाबा छुट्टी पर रहते थे उस दरमियान पूरा बॉर्डर हाई अलर्ट पर रहता था क्योकि उस वक़्त सैनिको को बाबा की मदद नहीं मिल पाती थी। मंदिर में बाबा का एक कमरा भी है जिसमे प्रतिदिन सफाई करके बिस्तर लगाए जाते है। बाबा की सेना की वर्दी और जुते  रखे जाते है। कहते है की रोज़ पुनः सफाई करने पर उनके जूतों में कीचड़ और चद्दर पर सलवटे पाई जाती है।

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गंगटोक की पहाड़ पर भारत-चीन सीमा – फौजी हरभजन सिंह का मंदिर, जो मौत के बाद भी करते हैं ड्यूटी


आस्था का केंद्र है मंदिर, कई तरह की है मान्यताएं

शहीद फौजी हरभजन सिंह का मंदिर, बाबा हरभजन सिंह के नाम से प्रसिद्द


बाबा हरभजन सिंह का मंदिर सैनिको और लोगो दोनों की ही आस्थाओ का केंद्र है। इस इलाके में आने वाला हर नया सैनिक सबसे पहले बाबा के धोक लगाने आता है।  
इस मंदिर को लेकर यहाँ के लोगो में एक अजीब सी मान्यता यह है की यदि इस मंदिर में बोतल में भरकर पानी को तीन दिन के लिए रख दिया जाए तो उस पानी में चमत्कारिक औषधीय गुण आ जाते है।  इस पानी को पीने से लोगो के रोग मिट जाते है। 
इसलिए इस मंदिर में नाम लिखी हुई बोतलों का अम्बार लगा रहता है। यह पानी 21 दिन के अंदर प्रयोग में लाया जाता है और इस दौरान मांसाहार और शराब का सेवन निषेध होता है।

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सिक्किम से मौर्य न्यूज18 की खास रिपोर्ट

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