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होमटॉप न्यूज़लोकतंत्र पर भारी पड़ता 'लोग'तंत्र ! Maurya News18

लोकतंत्र पर भारी पड़ता ‘लोग’तंत्र ! Maurya News18

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26 जनवरी की हिंसा अभिव्यक्ति की आजादी पर भद्दा मजाक

अतुल कुमार, पटना, मौर्य न्यूज18 ।

FARMERPROTEST

26 जनवरी, 2021 की घटना की आप जितनी निंदा कर लें कम है लेकिन यह सिर्फ निंदा या माफी मांगने की बात नहीं है बल्कि इससे लोकतंत्र पर लोगतंत्र के हावी होने का अहसास होता है। इससे सरकार की बेबसी भी झलकती है। दिल्ली में किसानों ने, न…न उपद्रवियों ने जो तांडव मचाया और पुलिस उन्हें रोकने की बजाय बैकफुट पर दिखी, यह कहीं से भी मोदी-शाह की कूटनीति तो नहीं कही जा सकती।

क्या केवल सहानुभूति बटोरने की खातिर सरकार लाल किले को किसी के हवाले कर सकती है…जो दिल्ली हमारी आन-बान और शान है, उसे हुड़दंगियों के हवाले कर सकती है। क्या 26 जनवरी को जो कुछ हुआ वह लोकतंत्र के नाम पर, अभिव्यक्ति की आजादी पर भद्दा मजाक नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि सरकार ने जानबूझकर यह सब होने दिया ताकि वह फाइव स्टार किसान आंदोलन को कुचल सके। किसान उत्सव, जी हां, ये उत्सव नहीं तो और क्या है, जहां नहाने के लिए गर्म पानी मिले, कपड़े धोने के लिए वासिंग मशीन की सुविधा हो, खाने के लिए लंगर की व्यवस्था हो, सोने के लिए तंबू मिले तो फिर इसे आप क्या कहेंगे…

यूट्यूबर्स ने राकेश टिकैत जैसे लोगों का बढ़ाया मन

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कुछ बड़े यूट्यूबर्स जिन्होंने वीडियो के व्यूज व सब्सक्राइबर्स को बढ़ाने की खातिर उछल-उछलकर पांच सितारे किसान आंदोलन का कवरेज किया। इसे स्वतंत्रता आंदोलन की तरह पेश किया। राकेश टिकैत जैसे तथाकथित किसान नेताओं का हीरो की तरह इंटरव्यू लिया। उन्हें बीच सड़क पर हुक्का पीते ऐसे दिखाया मानो वो हीरो की भूमिका में हों और वहां किसी फिल्म की शूटिंग चल रही हो। वे लोग देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के लिए वहां बैठे हों। आप राकेश टिकैत की बोली सुनिए। हर लफ्ज में दंभ झलकेगा। हर वाक्य में सरकार को चैलेंज। ट्रैक्टर मार्च से पहले सोशल मीडिया में उनका एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ जिसमें वे कह रहे हैं कि सरकार अब मान नहीं रही है डंडा लेकर आ जाओ…पहले भी कई दफे वे कह चुके हैं कि सरकार मानेगी कैसे नहीं, मैं तो मनवाकर ही दम लूंगा।

राकेश टिकैत वाला वीडियो देखिए …।

https://fb.watch/3xdchbWdJi/

क्या यह हमारे लोकतंत्र की, संविधान की कमजोरी नहीं है…

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संविधान में दिए गए अधिकारों का यही मतलब है कि आप धरना-प्रदर्शन व रैली के नाम पर कहीं भी जाइए और तोड़फोड़ शुरू कर दीजिए। कहीं भी जाइए और तंबू गाड़ दीजिए कि भाई मुझे ये कानून पसंद नहीं है, ये कानून वापस लो नहीं तो मैं ऐसी-की-तैसी कर दूंगा। दिल्ली की गद्दी हिला दूंगा। लाल किले पर अपना झंडा फहरा दूंगा। क्या ऐसी घटनाओं से हमारे सरकार व कानून का इकबाल खत्म नहीं होता…गणतंत्र का मजाक नहीं बनता। लोकतंत्र पर लोगतंत्र हावी नहीं होता। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि सरकार ने कूटनीति के तहत यह सब होने दिया ताकि हुड़दंगियों का हंगामा देखकर आम जनता की सहानुभूति उसे मिल सके। लेकिन क्या दिल्ली व लाल किले में घुसकर इस तरह का हंगामा, भारत की सुरक्षा व अस्मिता से खिलवाड़ नहीं है। माना कि जानमाल के स्तर पर कोई बड़ी क्षति नहीं हुई लेकिन यदि हो जाती तो, इसकी जवाबदेही कौन लेता…सरकार, किसान संगठन या फिर दिल्ली पुलिस।

अभी नहीं तो कभी नहीं

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26 जनवरी की घटना पूरी तरह से दिल्ली पुलिस और सरकार के स्तर पर एक बड़ी चूक है। आपको बाहर के दुश्मनों से कम और घर में छिपे शत्रुओं से निपटने की ज्यादा जरूरत है। बाहर के दुश्मन तो पहचान में आ जाएंगे लेकिन इंसान की शक्ल में घूम रहे भेड़ियों की शिनाख्त में मशक्कत करनी पड़ेगी, इसीलिए अभी नहीं तो कभी नहीं ठानकर देश हित में कठोर फैसले लेने पड़े तो लीजिए, कानून बनाने पड़े तो बनाइए कि लोकतंत्र के नाम पर अब कोई अपनी आजादी का बेजा इस्तेमाल नहीं करेगा। धरना-प्रदर्शन, रैली के नाम पर कोई अपनी गोटी सेट नहीं करेगा। सोशल मीडिया को कोई अपने आंदोलन का हथियार नहीं बनाएगा।

दिल्ली पुलिस के कमिश्नर घटना के बाद कह रहे हैं कि किसान नेताओं ने उनके साथ विश्वासघात किया। उन्होंने पहले ही प्लान बी बनाकर क्यों नहीं रखा था। उन्हें यह मानकर चलना चाहिए था कि जब भीड़ बढ़ जाएगी तो उसका कंट्रोल किसी नेता के हाथ में नहीं होगा। भीड़ कभी भी बेकाबू हो सकती है, वैसे हालात से निपटने के इंतजाम पहले से होने चाहिए थे। लाल किले जैसी जगहों की सुरक्षा क्या भगवान भरोसे थी…पूरी दुनिया में क्या मैसेज गया कि भारत को पराजित करने के लिए उसके अपने लोग ही काफी हैं। क्या गोली-बारूद, टैंक-मिसाइल केवल बाहर के दुश्मनों से लड़ने के लिए बनाए गए हैं। घर के भेदिए जवानों पर ट्रैक्टर चढ़ाएं, लाठियां बरसाएं और सरकार कान में तेल डालकर सोती रहे। क्या अराजक तत्वों से निपटने में हमारी पुलिस नाकाम है। आने वाली पीढ़ी जब इस घटना के बारे में जानेगी तो वो ऐसे सवाल जरूर करेगी।

कहां गए फाइव स्टार किसान आंदोलन को कवर करनेवाले तथाकथित पत्रकार

राकेश टिकैत जैसे लोगों को हीरो बनानेवाले यूट्यूबर्स ने चुप्पी साध ली है। कम-से-कम फेसबुक पर दिल्ली हिंसा को लेकर निंदा के दो-चार शब्द ही लिख डाले होते। एक पत्रकार से यही उम्मीद की जाती है कि वह दोनों पक्षों की बातों को सामने लाए। किसान उत्सव को शुरू से कवर करनेवाले पत्रकार क्या 26 जनवरी के दिन पूरी-जलेबी खाकर गणतंत्र को शर्मसार होते हुए देख रहे थे या कैमरे व मोबाइल से फुटेज भी बना रहे थे। अब तक तो किसी ने भी इससे संबंधित कोई वीडियो नहीं डाला है। देशभक्ति, सिद्धांत, बड़ी-बड़ी बातें सब जाए भाड़ में, बस यूट्यूब पर कुछ ऐसा दिखाओ कि व्यूज, फॉलोवर्स और सब्सक्राइबरों की संख्या बढ़ती जाए।

पटना से मौर्य न्यूज18 के लिए अतुल कुमार की रिपोर्ट ।

ATUL KUMARhttp://mauryanews18.com
Special Correspondent, Maurya News18

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