Google search engine
गुरूवार, जून 24, 2021
होमटॉप न्यूज़पंकज त्रिपाठी ,बिहार से बॉलीवुड का सफर ! Maurya News...

पंकज त्रिपाठी ,बिहार से बॉलीवुड का सफर ! Maurya News 18

-

प्रारंभिक पढाई

पंकज त्रिपाठी का जन्म 5 सितम्बर 1976 को बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंड गाँव में एक किसान परिवार में हुआ. वे दो भाई और दो बहने है . घर में किसी का कला के क्षेत्र से कुछ लेना-देना नहीं है .

वे कहते है-

“शुरुआत की मेरी पढाई ऐसे प्राकृतिक वातावरण में हुई है जहाँ कोई प्रदुषण नहीं था . पांचवी कक्षा तक हमलोग पेड़ के निचे बैठकर पढ़ते थे क्योकि वहां कोई स्कूल नहीं था . यहाँ तक की मेरे गाँव में बिजली अभी कुछ साल पहले ही पहुंची है.”

पिताजी बनाना चाहते थे डॉक्टर !

पंकज के पिताजी बचपन में उन्हें जी पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर बनाना चाहते थे. उनकी ख़्वाहिश थी उनका बेटा पटना जैसे बड़े शहर में काम करे और परिवार का नाम रौशन करे. इसलिए उनके माँ बाप ने पढाई करने के लिए उन्हें पटना भेज दिया . उन्होंने बायोलॉजी से इंटर किया है और कुछ सालों तक डॉक्टरी की कोचिंग भी की . दो दफे इम्तिहान भी दिया लेकिन डॉक्टरी के लिए जितने नंबर चाहिए होते थे उतने नहीं आ पाए. पढ़ने में वे बुरे नहीं थे पर उनका पढाई में मन नहीं लगता था .

सात दिनों के लिए जेल भी गए !

पटना आकर पंकज एक छात्र संगठन से जुड़ गए . एक आंदोलन के दौरान सात दिन की छोटी सी जेल यात्रा भी हुई. इस दौरान उनकी दोस्ती वाम दल के सदस्यों से हो गयी . जेल से निकलने के बाद उनके दोस्तों ने कालिदास रंगालय में नाटक देखने चलने को कहा . पंकज नाटक देखने चले गए फिर लगातार एक साल तक नाटक देखते देखते वे एक गंभीर दर्शक बन गए . फिर धीरे-धीरे रुझान बढ़ने लगा और फिर वे रंगमंच के ही होकर रह गए.

पंकज त्रिपाठी का जीवन परिचय – Pankaj Tripathi Biography in Hindi

जीवन का महत्वपूर्ण मोड़

उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने लक्ष्मण नारायण राय का नाटक अँधा कुआं देखा . उसमे प्रणिता जायसवाल की अदाकारी देख वो रो पड़े . तब उन्होंने नाटक के महत्त्व का पता चला . फिर उन्होंने दो साल के लिए Bihar Art Theatre को ज्वाइन किया .

मौर्या होटल पटना में भी काम किया !

इस बिच उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने उन्हें अभिनय के अलावा किसी और क्षेत्र में करियर बनाने की सलाह दी ।जिसके बाद पंकज ने पटना में फूड क्राफ्ट इंस्टीट्यूट में एक होटल प्रबंधन पाठ्यक्रम किया। बाद में, उन्होंने मौर्य होटल, पटना में नाइटशफ़्ट में रसोई पर्यवेक्षक के रूप में काम किया ।

दो बार एनएसडी से रिजेक्ट हुए !

पंकज त्रिपाठी का जीवन परिचय – Pankaj Tripathi Biography in Hindi

एनएसडी में अपने चयन को याद करते हुए, वे कहते हैं,

“मुझे एक जुलाई दोपहर को मेरी टिन की छत पर गिरने वाली बारिश याद है। जब मैं अपने कमरे में बैठा था तो खिड़की के बाहर मैंने देखा की बारिश में एक डाकिया रेनकोट में पहुंचा। वह एनएसडी का लोगो लगा हुआ एक सफेद लिफाफा लेकर मेरे पास आया। तब मुझे एहसास हुआ कि मेरा एनएसडी में चयन हो गया है और मैं रोने लगा। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। मैं पूरे देश के उन 20 छात्रों में से था जिन्हें चुना जाना था ”

पिता को दिलाया नौकरी का भरोसा

उन्होंने अपनी होटल की नाइट शिफ्ट की नौकरी छोड़ दी। उन्होंने अपने माता-पिता को आश्वस्त किया कि NSD से डिग्री हासिल करने के बाद वह या तो एक ड्रामा प्रोफेसर या शिक्षक बन जाएंगे। उनके पिता अब थोड़ा आश्वस्त थे कि उनको नौकरी मिल जाएगी । 2001 से 2004 तक उन्होंने वहां ट्रेनिंग की . NSD के बाद, पंकज पटना लौट आए . इसी बीच उसकी शादी हो गई।

हिंदी रंगमंच से मुश्किल था गुजारा करना

चार महीने तक पटना में रंगमंच किया तो पंकज को महसूस हुआ कि हिंदी रंगमंच में गुज़ारा करना मुश्किल है . इसे अभी भी शौकिया लोग चलाते हैं या फिर ये सरकारी अनुदान से चलता है. पंकज कहते है – सरकारी अनुदान के लिए आपको बहुत सारे लोग के सामने अपनी रीढ़ झुकानी होती है और मेरी रीढ़ की हड्डी तनी हुई है, मैं झुक नहीं सकता. मैं विनम्र हूं और ये गुरूर की बात नहीं हैं लेकिन मुझे चमचई पसंद नहीं.

तो अब पंकज के सामने एक ही विकल्प बचा था कि मुंबई जाओ. 16 अक्टूबर 2004 को मैंने पत्नी के साथ मुंबई पहुंच गया. उस समय पैसों की बहुत ताना-तानी होती थी . वे 46000 रुपये लेकर मुम्बई आये थे जो की तीन महीने के अन्दर ही ख़त्म हो गए . उनकी पत्नी ने बीएड किया था इसलिए उन्होंने एक स्कूल में नौकरी कर ली. उनके ख़र्चे बहुत कम थे तो किसी भी तरह से परिवार चल जाता था.

पंकज कहते है –

“मैं बंबई सिर्फ गुज़ारा करने आया था स्टार बनने नहीं. मुझे वो भूख नहीं थी कौन मुझे बतौर हीरो या बतौर विलेन लॉन्च करेगा. जैसे खुदरा किसान होता है जिसके खेत में दो किलो भिंडी होती है तो वह ख़ुद ही बाज़ार बेच के चला आता है. मैं वैसे ही खुदरा एक्टर था जो एक किलो भिंडी लेकर बंबई आया था.”

10 से 12 साल के संघर्ष के दौरान बहुत से छोटे मोटे रोल किये

फिर मुंबई में छोटे-छोटे, एक-एक सीन का दौर चालू हुआ. 10 से 12 साल के संघर्ष के दौरान पंकज सब कुछ कर लेते  थे. टीवी शो, कॉरपोरेट फिल्में या ऐड मिल गया तो वो कर लिया. बस यही ख्याल था कि बंबई में किसी तरह टिक जाना है. हां, लेकिन इस दौरान वे हमेशा एक्टिंग के बारे में सोचते रहते थे  कि कैसे दूसरों से अलग करना है ताकि लोग उन पर ध्यान दें कि ये कौन है.वो रोल को ईमानदारी के साथ करना चाहते थे .

वे कहते है –

“बिहारियों में संघर्ष की क्षमता होती है. हमारा 10वीं तक का जीवन तो अंधेरे में गुज़रा है. बल्ब और ट्यूबलाइट की ज़रूरत नहीं थी हमें. फ्रिज का खाना हमें आज भी अच्छा नहीं लगता.”

बहुत सारे ऑडिशन दिए पर नहीं मिल पाई सफलता !

काम के लिए डायरेक्टर्स और निर्माताओं के ऑफ़िस के बाहर लम्बी लाइन के बीच एक आम-सी कद-काठी और सामान्य से चेहरे वाले पंकज ख़ुद को काफ़ी असहज महसूस करते थे. इसके बावजूद उन्होंने  हिम्मत नहीं हारी और लगभग डायरेक्टर्स, प्रोडूसर्स से ले कर विज्ञापन फ़िल्मों के लिए ऑडिशन दिए. इस दौरान पंकज ने कई छोटी-बड़ी फ़िल्मों में ऐसे किरदार निभाए, जो किसी की नज़र पर तो नहीं पड़े, पर उन्होंने बॉलीवुड की बेगानी इंडस्ट्री में कुछ दोस्त बना दिए.

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर से मिली पहचान

इसी बीच उन्हें पता लगा कि अनुराग कश्यप अपनी फ़िल्म ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के लिए एक्टर्स की तलाश कर रहे हैं. ये ख़बर सुनते ही पंकज एक बार फिर ऑडिशन देने पहुंच गए, जहां कॉस्टिंग डायरेक्टर मनीष छाबरा की नज़र पंकज पर पड़ी. मनीष ने उन्हें फ़िल्म में सुल्तान मिर्ज़ा का किरदार सौंपा, जिस पर पंकज खरे उतरे.

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के इस किरदार ने बॉलीवुड में पंकज के लिए अपने दरवाजे खोल दिए, जिसके बाद पंकज ने ‘फुकरे’, ‘निल बट्टे सन्नाटा, ‘बरेली की बर्फी’ जैसी बॉलीवुडिया फ़िल्मों के साथ ही ‘मसान’ और ‘मांझी’ जैसी आर्ट फ़िल्में भी की.

“हमें ब्रेक किसी ने नहीं दिया है. हर किसी ने ‘ब्रेक’ ही दिया है कि रुकते जाओ… तुम कहा जा रहे हो रुको. तो हमारा ‘ब्रेक’ वैसा वाला था. जैसे नल ढीला हो तो एक-एक बूंद पानी टपकता रहता है. वैसे ही हम एक-एक सीन टपकते-टपकते इकट्ठा हो गए.”

पंकज कहते है – ये एक पड़ाव था लेकिन एक बहुत ही शौकिया स्तर पर था. हां, इसे बीजारोपण ज़रूर कह सकते हैं. ये वैसा बीजारोपण था कि आप एक बीज किसी बंजर ज़मीन पर फेंक दें जिसके जमने की उम्मीद न के बराबर होती है. हमारे यहां का जो थियेटर था वो बंजर ज़मीन ही था !

पंकज कहते है –

“मैं हर नकारात्मक किरदार में सकारात्मकता लाना चाहता हूं. किसी भी प्रकार की एक्टिंग हो उसमें रस बना रहना चाहिए क्योंकि दर्शक उसी वजह से मुझे देखेंगे. नीरस हो जाऊंगा तो लोग सिनेमा हॉल में 200 रुपया का टिकट लेकर मेरा प्रवचन सुनने नहीं आएंगे.”

ALSO READ  राजद से TEJ बोले - CHIRAG तय करें कि संविधान के साथ रहेंगे या गोलवलकर के साथ

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Must Read

राजद से TEJ बोले – CHIRAG तय करें कि संविधान के...

तेजस्वी ने चिराग पासवान को साथ आने का दिया न्योता राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद जल्द होंगे पटना में, शुरू होगी राजनीति पॉलिटिकल ब्यूरो, पटना, मौर्य...