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शिक्षक, स्टूडेंट, धन, रोजगार, शिक्षा इसके बारे में नई शिक्षा नीति में क्या व्यवस्था है ! समझिए । Maurya News18

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विशेष – नई शिक्षा नीति से जुड़ी रिपोर्ट । PART -3

नई दिल्ली, मौर्य न्यूज18 ।

नई शिक्षा नीति से संबंधित रिपोर्ट की ये तीसरी कड़ी है। इस कड़ी में मौर्य न्यूज18 आपको बातने जा रहा है कि आखिर शिक्षक, स्टूडेंट , रोजगार, धन इस सबके लिए क्या व्यवस्था है। नई शिक्षा नीति पहले से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था से कितना अलग है । वही शिक्षक आखिर कैसे स्टूडेंट के बीच नई व्यवस्था के साथ पढ़ाएंगे। कैसे स्टूडेंट की पढ़ाई में बदलाव लाएंगे। धन कहां से आएगा। कब और कैसे लाभ होगा। बहुत सारी बातें हैं जिसे देश के हर नागरिकों को समझना चाहिए। पेश है मौर्य न्यूज18 के अतिथि संपादक रामनाथ राजेश की रिपोर्ट ।

शिक्षकों के प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीक पर जोर  

नई शिक्षा नीति में सबसे अधिक बल शिक्षकों को प्रशिक्षित करने पर दिया गया है. शिक्षकों को नई तकनीक से अवगत कराना और उनको उस तरह से तैयार करना कि वह इस तकनीक के जरिए जो वह कहना चाहते हैं कहीं भी बैठे बच्चे के दिमाग  तक पहुंचाने में कामयाब रहें. आंकड़ों के हिसाब से देश में मात्र 14-15 फीसद  शिक्षक ही प्रशिक्षित हैं. शिक्षकों के प्रशिक्षण के बिना गुणवत्ता वाली शिक्षा की बात भी बेमानी होगी.

एक साथ लिए जा सकते हैं कला और विज्ञान के विषय

एक बात इस शिक्षा नीति में जो छात्रों के हित में सबसे अधिक अच्छी है कोई की कोई भी छात्र अपने पसंद के हिसाब से अपने विषय का चुनाव कर सकता है. कहने का मतलब यह है कि कोई हिंदी साहित्य पढ़ने वाला भी अपने पाठ्यक्रम में विज्ञान का चुनाव कर सकता है. अब यह बात कहीं आड़े नहीं आएगी कि कला की पढ़ाई करने वाला  विज्ञान को अपनी पढ़ाई के विषय के रूप में नहीं चुन सकता और डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता.

 स्नातक का पाठ्यक्रम अब 4 साल का 

सबसे ज्यादा जोर उच्च शिक्षा में किसी भी वर्ष पढ़ाई छोड़ देने और फिर कुछ समय बाद फिर से आगे की पढ़ाई जारी रखने का विकल्प दिया गया. कला एवं विज्ञान में मौजूदा अंडर ग्रैजुएट कोर्स जो अभी 3 साल का है इसे बढ़ाकर 4 साल का कर दिया गया है. छात्र के पास एक साल के बाद सर्टिफिकेट प्रोग्राम, दो साल के बाद डिप्लोमा प्रोग्राम, या 3 साल के बाद डिग्री प्रोग्राम के बाद पढ़ाई छोड़ने का विकल्प है. 

अनुसंधान के लिए ही चौथे साल की पढ़ाई जरूरी 

अनुसंधान में अपना करियर बनाने वाले छात्रों के लिए चौथे साल का विकल्प चुनना है.और इसमें सफल होने के बाद वे सीधे पीएचडी के लिए दाखिला ले सकते हैं. यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि यदि किसी छात्र ने एक साल के सर्टिफिकेट प्रोग्राम के बाद  किसी कारण से पढ़ाई छोड़ दी है तो वह एक निश्चित अवधि के बाद डिप्लोमा  की पढ़ाई के लिए दाखिला ले सकता है. उसी तरह डिप्लोमाधारी यदि पढ़ाई छोड़ने के बाद बाद में डिग्री की पढ़ाई करना चाहता है तो वह दाखिल पाने का अधिकारी होगा.

नहीं रहेंगे संबद्धता देने वाले विश्वविद्यालय

नई शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा में सिर्फ कॉलेजों को संबद्धता देने वाले विश्वविद्यालयों का वजूद खतरे में है. या तो यह खुद को बदलेंगे या खत्म हों जाएंगे. अब तीन तरह के विश्वविद्यालय बनाए जाने हैं.

पहला है- बहुविषयक अनुसंधान विश्वविद्यालय, दूसरा है बहुविषयक शिक्षण  विश्वविद्यालय और तीसरा है बहुविषयक स्वायत्त कॉलेज.

आखिर क्या है मातृभाषा में पढ़ने का मतलब

  वर्ष 1998-99 बोलोग्ना कन्वेंशन हुआ था. और उसमें यूरोपीय देशों ने शिक्षा का स्तर में सुधार के लिए शिक्षा के मानकीकरण की बात स्वीकार की थी.  उसका अपनाने के बाद आज यूरोपीय शिक्षा की स्थिति बहुत बेहतर है. 

यह बात देखी गई है कि दुनिया के अधिकांश देश चीन, रूस और जर्मनी को जापान सबने पढ़ाने के तरीके  के लिए अपनी मातृभाषा को ही चुना और इसके परिणाम बहुत बेहतर हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन देशों के छात्रों की अनुसंधान के क्षेत्र में तूती बोलती है.

शिक्षा के लिए कहां से आएगा धन? 

बात आकर वही टिक जाती है  कि सरकार शिक्षा के क्षेत्र में इतना निवेश करने के लिए धन कहां से जुटाएगी. खासकर ऐसे समय में जब चीन और पाकिस्तान दोनों पड़ोसी देश भारत के लिए रोज नई मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में रक्षा बजट किसी भी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी. इससे भी अधिक कोविड-19 वायरस ने देश के स्वास्थ्य क्षेत्र की खस्ता हालत सबके सामने खोल करके रख दी है.  इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र की उपेक्षा कम से कम फिलहाल नहीं की जा सकती है. आने वाले वर्षों में रक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र बजटीय प्रावधान के मामले में निश्चित रूप से अधिक वरीयता पाएंगे. ऐसी स्थिति में शिक्षा क्षेत्र में निवेश के लिए बहुत अधिक धन जुटाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होगी.

नौकरी गंवा चुके लोगों की समस्या

कोरोना महामारी के बाद लाखों लोग अपनी नौकरी गंवा चुके हैं. लघु उद्योग बंद हो चुकें हैं. कोरोना काल ने छोटे व्यवसाइयों की कमर तोड़कर रख दी है. बेरोजगारी और गरीबी  की मार  झेल रहे भारतीय  बच्चों के ऐसे अभिभावकों के सामने ई-लर्निंग  की बात करना उन्हें चिढ़ाने जैसा लगेगा. शिक्षा बजट बढ़ाएं बिना सारी नई शिक्षा नीति कागजी ही साबित होगी. 

आज जब विश्वविद्यालयों में बिजली और पानी के संकट का समाधान ही नहीं हो पा रहा है. तो शोध के विद्यार्थियों के लिए आधुनिक उपकरणों का सपना दिखाना कहां तक जायज होगा. केंद्र और राज्य सरकारों को इसके लिए मिलकर सामूहिक प्रयास करना होगा अगर विश्वविद्यालयों को बनाए रखना है तो उनके बुनियादी ढांचे को सुधारना ही होगा और यह पैसे के बिना संभव नहीं है.

अभी बहुत अधिक निवेश की जरूरत नहीं

नई शिक्षा नीति को बनाने वाली समिति के अध्यक्ष डॉ. कस्तूरीरंगन पैसे की व्यवस्था को लेकर बहुत अधिक चिंतित नहीं हैं. एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि बहुत अधिक पैसे की जरूरत तत्काल नहीं पड़ने वाली है. जैसे-जैसे समय गुजरेगा वैसे-वैसे अधिक निवेश की जरूरत पड़ेगी. यह अलग बात है कि उसके लिए तैयारी अभी से करनी होगी.  

दुनिया भर के अच्छे विश्वविद्यालय भारत में खोल सकेंगे अपनी शाखा

 नई शिक्षा नीति में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों को भारत में आकर अपना कैंपस खोलने की इजाजत देने की बात कही गई है. कई यूरोपीय देशों के विश्वविद्यालय भारत में आने को तैयार भी है क्योंकि वहां वे खुद वित्तीय संसाधनों की कमी से जूझ रहेऔर उन्हें अपना खर्च चलाने के लिए विदेशी छात्रों के नामांकन से मिले पैसे पर ही बहुत हद तक निर्भर रहना पड़ रहा है. क्या ऐसे विश्वविद्यालय अपने देश में आकर वैसे भारतीय छात्रों  का कल्याण कर पाएंगे जो मामूली किताबें भी खरीदने की स्थिति में नहीं हैं? क्या वे वैसे चंद नवधनाढ्य वर्ग के बच्चों के चोंचलेबाजी के केंद्र बनकर नहीं रह जाएंगे जिनके पास इनकी मोटी फीस देने के लिए  पैसे की कोई कमी नहीं है? इससे नई शिक्षा नीति का उद्देश्य पूरा हो पाएगा, इसे देखना होगा ।

गेस्ट रिपोर्ट :

आपने रिपोर्ट लिखी है ।

रामनाथ राजेश

आप वरिष्ठ पत्रकार हैं और लेखक भी। आप देश के विभिन्न राष्ट्रीय समाचार पत्रों में संपादकीय विभाग में उच्च पदों पर योगदान देते रहे हैं।

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