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महाराष्ट्र में सीखा दांवपेच और बिहार में भारत भीम को चटाई धूल, जानिए कौन है वह वीर पहलवान। Maurya News18

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मौर्य न्यूज18, पटना

अतुल कुमार

यह कहानी है बाढ़ (बिहार) के रहनेवाले विवेका पहलवान की, जिन्होंने अपने दमखम से सूबे के बाहर भी अपनी पहचान बनाई। लगभग तेरह साल की उम्र से ही विवेका घर पर ही पहलवानी के दांवपेच सीखने लगा था। घरवालों ने देखा कि बच्चे में कुश्ती के प्रति अगाध प्रेम है तो 18 साल की उम्र में उसे और बेहतर प्रशिक्षण के लिए महाराष्ट्र के कोल्हापुर में भेज दिया। वहां पर हिंद केसरी दीनानाथ सिंह लड़कों को पहलवानी के दांवपेच सिखाते थे। दीनानाथ सिंह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहनेवाले थे।

विवेका पहलवान के गुरु हिंद केसरी दीनानाथ सिंह

अब विवेका भी गुरु दीनानाथ सिंह की देखरेख में पहलवानी के गुर सीखने लगा। बहुत जल्दी ही विवेका कुश्ती के सभी दांवपेच में माहिर हो गया। थोड़े दिनों बाद वह क्षेत्रीय स्तर पर कुश्ती प्रतियोगिता में भी भाग लेने लगा था। इस तरह महाराष्ट्र में कुछ साल रहने के बाद विवेका बिहार लौट आया। अब लोग उसे विवेका नहीं बल्कि विवेका पहलवान कहने लगे थे।

इसी बीच विवेका को पता चलता है कि स्थानीय स्तर पर दंगल होने वाला है। वह भी वहां पहुंचता है और आयोजकों से कुश्ती लड़ने की इच्छा जाहिर करता है। उस दंगल में पहलवान लाल बहादुर सिंह (बिहार पुलिस का जवान) का जलवा था। अखाड़े में उसके सामने कोई नहीं टिक रहा था। कई लोगों ने विवेका को मना भी किया कि लाल बहादुर से भिड़ना ठीक नहीं रहेगा लेकिन विवेका कहां माननेवाला। वह तो घर से ठानकर ही चला था कि हर हाल में कुश्ती लड़नी है।

विवेका पहलवान

खैर, मंच से घोषणा होती है कि कुछ ही देर में लाल बहादुर सिंह से विवेका पहलवान का मुकाबला होगा। लगभग पांच मिनट के अंदर ही विवेका पहलवान लाल बहादुर को पटक देते हैं। कुश्ती देख रहे लोगों को सहसा यकीन नहीं होता है क्योंकि उस वक्त लाल बहादुर का पहलवानी में बड़ा नाम था। खैर, आयोजक विवेका पहलवान की जीत की घोषणा करते हैं और लोग उनके नाम का जयकारा लगाने लगते हैं।

विवेका पहलवान अपने दामाद आनंद के साथ।

इसके बाद 1977 में भारत भीम जनार्दन सिंह को एक मुकाबले में उन्होंने 35 मिनट में चित कर दिया। जनार्दन सिंह गोरखपुर के रहनेवाले थे। विवेका पहलवान की जीत का यह कारवां बढ़ते गया। साल 1978 में आरा के रमना मैदान में बिहार केसरी के लिए दंगल का आयोजन किया गया था। इस मुकाबले में विवेका पहलवान ने बड़हिया के सियाराम सिंह को पराजित किया था।

विवेका पहलवान घोड़े से खेलते हुए।

1978 में गया के कोरमत्थू गांव में उस्ताद त्रिवेणी सिंह ने कुश्ती का आयोजन करवाया था, जिसे देखने के लिए काफी लोग जमा हुए थे। इस दंगल में जहानाबाद के रविंद्र पहलवान से उनकी भिड़ंत हुई थी। कहा जाता है कि यह मुकाबला लगभग 45 मिनट तक चला था लेकिन हार-जीत का फैसला नहीं हो पाया।

विवेका पहलवान

इसके बाद बनारस के रहनेवाले झारखंडे राय से विवेका पहलवान का मुकाबला हुआ। फिर हिसार में करतार सिंह से भिड़े। महाराष्ट्र के शिवाजी बवास्ते को चित किया। इसके बाद हरियाणा और दिल्ली में कई दंगल प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। धीरे-धीरे उम्र बढ़ती गई और बाद में उन्होंने दंगल में भाग लेना बंद कर दिया। अभी वे (मई, 2021) अपने नाती-पोतों के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं।   

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