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चीन, नेहरू और कॉम्युनिस्टों के संबंधों पर डॉ लोहिया ने क्या कहा था…! Maurya News18

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GUEST REPORT

कैलाश मान सरोवर की चर्चा करते हुए डा.राम मनोहर लोहिया ने लिखा था कि

‘‘दुनिया में कौन सा कौम है जो अपने सबसे बड़े देवी -देवताओं को परदेश में बसाया करते हैं ?’’.

20 जून 20 । मौर्य न्यूज18 की गेस्ट रिपोर्ट ।

डा.राम मनोहर लोहिया चीन को विस्तारवादी मानते थे।

चीन की विस्तारवादी नीति की पुष्टि अन्य अनेक लोगों के साथ- साथ प्रजा समाजवादी पार्टी के तेज तर्रार सांसद नाथ पाई ने भी 1967 में लोक सभा में की थी।

नाथ पाई ने कहा था कि

‘‘सोवियत संघ की सीमा का जब चीन अतिक्रमण करने लगा तो चीनी चुनौती से सोवियत संघ के शासक भी घबराने लगे।

मास्को भी इस अन्याय को महसूस करने लगा।

अब मास्को के नेताओं ने भी तिब्बतियों की आजादी के बारे में बोलना शुरू किया। इस तथ्य को ताशकंद रेडियो नियमित रूप से प्रसारित कर रहा है।’’

भारत-चीन सीमा को लेकर दोनों देशों में पुराना विवाद रहा है।

यह विवाद औपनिवेशिक शासन की देन है।

पर, इस आग में घी का काम किया तिब्बत विवाद और चीन की विस्तारवादी नीति ने।

इस विवाद को लेकर जब चीन ने भारत पर हमला करके हमारी जमीन को हड़पा ,तब भी भारत की माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी /माक्र्सवादी/ने चीन को हमलावर नहीं माना।

हालांकि सोवियत पक्षी सी.पी.आई.की राय अलग थी। क्योंकि सोवियत संघ भी चीन की विस्तारवादी नीति का शिकार हो रहा था।

देश को लेकर कम्युनिस्टों से डॉ लोहिया को एक जबर्दस्त शिकायत थी…

डा.लोहिया की कम्युनिस्टों से यही शिकायत थी कि वे राष्ट्र की सीमाओं को लेकर देशभक्त नहीं हैं। जबकि उनमें गरीबों को लेकर जो दर्द है,वह सराहनीय है।

डा.लोहिया यह भी कहते थे कि जनसंघ में राष्ट्रभक्ति तो है पर उसमें इस देश के गरीबों के लिए दर्द नहीं है।

चीन पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करते रहे नेहरू

पंचशील के प्रणेता जवाहरलाल नेहरू चीन पर जरूरत से अधिक विश्वास करते थे। उन्हें धोखा मिला और चीन के भारत पर हमले के बाद वे इतना टूट चुके थे कि उसके 18 महीने बाद ही उनका निधन हो गया। पर डा. लोहिया चीन की मंशा के खिलाफ भारत सरकार को उससे पहले से ही चेताते रहे थे। पर केंद्र सरकार ने उस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया।

लोकसभा में सवाल उठाते रहते थे लोहिया

उधर चीनी आक्रमण से पहले से ही चीन भारतीय सीमा पर अतिक्रमण करता रहा । इसके खिलाफ लोक सभा में आवाजें उठती रहीं। आवाज उठाने वालों में डा.लोहिया प्रमुख थे। इस मुददे पर लोक सभा में जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के ही महावीर त्यागी के बीच एक बार दिलचस्प डायलॉग हुआ था।
चीन औऱ भारत ।

चीन के जमीन हड़पने पर क्या कहते थे नेहरू, सुनिए …..

जब चीन के विस्तारवादी रवैये की चर्चा हुई तो नेहरू ने संसद में कहा कि चीन ने हमारी उस जमीन पर कब्जा किया है जहां घास तक नहीं उगती। इस पर महावीर त्यागी ने कहा कि मेरे सिर पर तो एक भी बाल नहीं है, तो क्या मेरा सिर कटवा लोगे ?

तिब्बत,चीन और ब्रिटिश साम्राज्य को लेकर डा.लोहिया ने दिलचस्प बातें लिखी ।

उन्होंने लिखा कि चीन वाले तिब्बत पर अपना आधिपत्य बताने व जमाने के लिए तो अंग्रेजों को गवाह बताते हैं।

पर, अंग्रेजों द्वारा बनाई गई मैक मोहन सीमा रेखा को चीन नहीं मानता।

डा. लोहिया कैलाश मान सरोवर का जिक्र करते थे।

हिंदुओं के सबसे बडे़ तीर्थों में एक स्थल तिब्बत में है।

डा.लोहिया लिखते हैं कि दुनिया में कौन सा कौम है जो अपने सबसे बड़े देवी देवताओं को परदेश में बसाया करते हैं ?

सीमा को लेकर डा.लोहिया ने जो एक दिलचस्प किंतु सनसनीखेज तथ्य सरकार को दिया था,उसका जिक्र जार्ज फर्नाडिस ने लोक सभा में बाद में किया था।

जार्ज ने 1967 में कहा था कि

तिब्बत के साथ हिन्दुस्तान का रिश्ता…

‘तिब्बत के बारे में जब हम यह कहते हैं कि हिंदुस्तान के साथ उसका क्या रिश्ता रहा हैं तो मनसर गांव का उदाहरण दिया जाता है।
हिंदुस्तान -तिब्बत सीमा से तिब्बत के दो सौ मील अंदर का यह गांव चीनी आक्रमण होने तक हिंदुस्तान की सरकार को अपना राजस्व देता था।

पर इस सरकार को इसकी जानकारी तक नहीं थी।

डा. लोहिया ने इसकी खोज की और हिंदुस्तान के सामने रखा।

इस पर टोकते हुए कांग्रेस के वामपंथी सांसद शशि भूषण वाजपेयी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि

‘‘हां, वे लोग लगान शायद राम मनोहर लोहिया साहब को देते थे।

जार्ज ने अपना भाषण जारी रखते हुए कहा कि मगर आपकी सरकार को यह भी नहीं मालूम था।

भारतीय नेता नेहरू जी और डॉ लोहिया । फाइल फोटो

नेहरू जी ने डा. लोहिया से विनती की कि मेहरबानी करके वह सबूत हमारे हाथ में दे दो। तब लोहिया जी ने कहा कि आप खोज करो। खोज की गई और तब वह सही निकला। तब उनको मालूम हुआ कि लोहिया साहब ने जो कहा था,वह सही था। जब नेहरू की स्वीकारोक्ति की बात जार्ज ने बताई तो शशि भूषण चुप रह गये।

देश की सीमा व सुरक्षा पर देश के सांसद कैसी बात करते…

देश की सीमा व सुरक्षा जैसे नाजुक मामलों में भी इस देश के सांसद किस तरह की बातें संसद जैसे फोरम में भी करते थे,शशि भूषण की टिप्पणी इस बात की गवाह है। दरअसल चौथी लोक सभा में जब प्रतिपक्षी सदस्यों की सख्या सदन में बढ़ी तो बहस करने का उनका हौसला भी बढ़ा।

भारतीय संसद भवन ।

तिब्बत पर एक गैर सरकारी प्रस्ताव आया।

उस प्रस्ताव पर 30 जून और 14 जुलाई 1967 को बहस हुई।

तब लोहिया कन्नौज से और जार्ज फर्नाडिस दक्षिण बंबई से लोक सभा के सदस्य थे।तब संसद में सार्थक चर्चाएं हुआ करती थीं।

सदस्य व दर्शक दीर्घा में बैठे लोग भी उन बहसों को मनोयोगपूर्वक सुना करते थे। उस बहस के दौरान डा.लोहिया ने कहा कि आज दलाई लामा इस देश में हैं।
मैं इस मौके पर कोई कड़ा शब्द नहीं कहना चाहता हूं।

प्राचीन भारत की आखिरी राजधानी कन्नौज थी।

उसके आखिरी कवि राज राजेश्वर की चक्रवर्ती राज्य की यह परिभाषा सुना देना चाहता हूं। उन्होंने लिखा था कि बिंदुसार से लेकर कन्या कुमारी तक जो राज्य हो,वह चक्रवर्ती राज्य होता है।

बिंदुसार का मतलब है मान सरोवर।

लोहिया ने कहा कि हिंदुस्तान की ये सीमाएं जिस संधि के द्वारा निर्धारित की गई हैं,हमें उसी संधि को सामने रखना है। उसी को स्वीकार करना है। उन संधियों को नहीं जिनका जिक्र कुछ लोग इधर उधर की दो- चार किताबें पढ़कर किया करते हैं। वे कमजोर हिंदुस्तान की संधियां हैं। शक्तिशाली हिंदुस्तान की संधि के अनुसार इस देश की सीमाएं बिंदुसार से कन्या कुमारी तक है।

आपने स्टोरी लिखी है ….

सुरेंद्र किशोर

सुरेन्द्र किशोर

आप देश के प्रतिष्ठित सिनियर जर्नलिस्ट हैं। बिहार से हैं। आपने देश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्र-पत्रिकाओं और दैनिक अखबारों में अपना अहम योगदान दिया है। देश के बड़े दिग्गज नेताओं को आप कवर करते रहे हैं। आपकी लेखनी कायम है। और देश व समाज को नई दिशा देती रहती है।

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आभार..

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