Home खबर माया ईश्वर की है दासी : डा. स्वामी निर्मलानंद

माया ईश्वर की है दासी : डा. स्वामी निर्मलानंद

&NewLine;<ul class&equals;"wp-block-list">&NewLine;<li>जीवात्मा माया के फेर में पड़कर परमात्मा से बिछुड़ गया है और संसार के नाना प्रकार के दुखों को झेल रहा है<&sol;li>&NewLine;<&sol;ul>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<figure class&equals;"wp-block-image size-large"><img src&equals;"https&colon;&sol;&sol;mauryanews18&period;com&sol;wp-content&sol;uploads&sol;2025&sol;09&sol;1000031263-1024x576&period;jpg" alt&equals;"" class&equals;"wp-image-4443"&sol;><&sol;figure>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>रांची &colon; <&sol;strong>रांची जिला संतमत सत्संग समिति &lpar;Ranchi Jila Santmat Satsung Samiti&rpar; द्वारा आयोजित पक्ष ध्यान साधना शिविर के नौवें दिन सद्दग्रंथों के पाठ से यह ज्ञात हुआ कि सत्संग का प्रतिपाद्द विषय जीवात्मा माया परमात्मा है। प्रवचनकर्ता डा&period; स्वामी निर्मलानंद ने कहा जीवात्मा माया के फेर में पड़कर परमात्मा से बिछुड़ गया है और संसार के नाना प्रकार के दुखों को झेल रहा है। डा&period; स्वामी निर्मलानंद जी महाराज के सानिध्य में यह साधना शिविर चल रहा है। उन्होंने कहा कि मैं और मेरा&comma; तू और तेरा सब माया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है गो गोचर जंह लगि मन जाई&comma; सो सब माया जानहू भाई। हम पाते हैं कि माया की भयानक सेना संसार में फैली हुई है। काम&comma; क्रोध और लोभ उसके सेनापति और अभिमान&comma; छल और पाखंड आदि योद्धा हैं। यह माया ईश्वर की दासी है लेकिन समझ लेने पर वह झूठी हैं परंतु प्रभुकृपा के बिना छूटती नहीं है। <&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<figure class&equals;"wp-block-image size-large"><img src&equals;"https&colon;&sol;&sol;mauryanews18&period;com&sol;wp-content&sol;uploads&sol;2025&sol;09&sol;1000031275-1024x576&period;jpg" alt&equals;"" class&equals;"wp-image-4444"&sol;><&sol;figure>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>स्वामी जी ने इस विषय की गूढ़ता को स्पष्ट करते हुए कहा कि स्थूल&comma; सूक्ष्म&comma; कारण और महाकारण ये चारों जड़ शरीर हैं। इसके अंदर रहने पर सभी इंद्रियां नहीं छुटती हैं। इंद्रियों के साथ रहकर जो देखा व सुना जाता है वह परमात्मा की माया है। माया में रहकर जीव न तो अपनी पहचान कर पाता है न ही परमात्मा का साक्षात्कार कर पाता है। इन शरीरों से परे एक पांचवां शरीर कैवल्य शरीर है। यही शरीर परमात्मा का अत्यंत निकटवर्ती शरीर है। नादानुसंधान की क्रिया के द्वारा सूरत सब इंद्रियों से छूटकर अकेले कैवल्य शरीर में पहुंच कर अपना और परमात्मा का भी साक्षात्कार करती हैं कैवल्य शरीर में। <&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<figure class&equals;"wp-block-image size-large"><img src&equals;"https&colon;&sol;&sol;mauryanews18&period;com&sol;wp-content&sol;uploads&sol;2025&sol;09&sol;1000031266-1024x576&period;jpg" alt&equals;"" class&equals;"wp-image-4445"&sol;><&sol;figure>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>कैवल्य मंडल में परमात्मा का दर्शन तो होता है लेकिन उनसे मिल कर एकमय नहीं होता है। अतः यहां द्वैतता बनी रहती है। इसके आगे जब सूरत एक सारशब्द में लीन होती है तब द्वैतता मिट जाती है और जीव-पीव एक हो जाता है और यही साधना की पराकाष्ठा है। बता दें कि इस साधना शिविर में विभिन्न प्रांतों से आए साधक भक्ति में लीन हैं और ध्यानाभ्यास तथा सत्संग का लाभ ले रहे हैं। उन्होंने रांची नगर के सभी धर्म प्रेमियों से आग्रह किया कि अधिक से अधिक संख्या में आश्रम पहुंचकर साधु महात्माओं के दर्शन एवं प्रवचन का लाभ उठाएं।<br><strong>Maurya News18 Ranchi&period;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;

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