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प्रतिदिन सुनिये राग भैरवी की मंद बांसुरी ध्वनि, दर्द कम करने में मिलेगी मदद : प्रो. मृणाल पाठक

&NewLine;<ul class&equals;"wp-block-list">&NewLine;<li>यह शोधपत्र प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका करंट साइकियाट्री रिसर्च एंड रिव्यूज में प्रकाशित हुआ है<&sol;li>&NewLine;<&sol;ul>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<figure class&equals;"wp-block-image size-large"><img src&equals;"https&colon;&sol;&sol;mauryanews18&period;com&sol;wp-content&sol;uploads&sol;2025&sol;07&sol;Screenshot&lowbar;20250716-2231332-645x1024&period;png" alt&equals;"" class&equals;"wp-image-4086"&sol;><&sol;figure>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p><strong>रांची &colon;<&sol;strong> भारतीय शास्त्रीय संगीत और आधुनिक विज्ञान के संगम से बीआइटी मेसरा &lpar;BIT Mesra&rpar; के कलाकार&comma; संगीतकार और शिक्षाविद् प्रो&period; मृणाल कुमार पाठक ने एक अभूतपूर्व शोध का नेतृत्व किया है&comma; जो यह प्रमाणित करता है कि राग भैरवी की मंद बांसुरी ध्वनि &lpar;15DB&rpar; दर्द को कम करने में सक्षम है। उनका शोधपत्र Pain Alleviation through Raga Bhairavi &lpar;15dB&comma; Flute&rpar;&colon; Activation of the Hypothalamus-pituitary Axis and β-endorphin cAMP Pathway in Swiss Albino Mice प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Current Psychiatry Research and Reviews में प्रकाशित हुआ है। इस अनुसंधान में यह सिद्ध किया गया है कि जब स्विस एल्बिनो चूहों को राग भैरवी 15DB पर बांसुरी सुनाई गई&comma; तो उनके मस्तिष्क में बीटा-एंडोर्फिन का स्राव बढ़ा और हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी एक्सिस सक्रिय हुआ&comma; जिससे दर्द में उल्लेखनीय कमी आई। प्रो&period; मृणाल पाठक जो स्वयं एक ख्यातिप्राप्त रंगकर्मी और संगीतविद् हैं&comma; ने इस शोध को न केवल विज्ञानी दृष्टिकोण से आगे बढ़ाया बल्कि उसमें सांस्कृतिक और कलात्मक गहराई भी जोड़ी। यह शोध उनकी दूरदर्शी सोच और अंतरविषयक नेतृत्व क्षमता का परिचायक है। उनके सहयोगी पूर्व प्रोफेसर शक्ति पटनायक &lpar;फार्मेसी विभाग&comma; बीआइटी मेसरा&rpar;&comma; जो वर्तमान में संयुक्त राज्य अमेरिका में शोधरत हैं&comma; ने इस परियोजना में जैव-रसायन और औषध विज्ञान के दृष्टिकोण से बहुमूल्य योगदान दिया। <&sol;p>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<figure class&equals;"wp-block-image size-full"><img src&equals;"https&colon;&sol;&sol;mauryanews18&period;com&sol;wp-content&sol;uploads&sol;2025&sol;07&sol;Screenshot&lowbar;20250716-2232042&period;png" alt&equals;"" class&equals;"wp-image-4087"&sol;><&sol;figure>&NewLine;&NewLine;&NewLine;&NewLine;<p>यह शोध भारत की संगीत चिकित्सा परंपरा को विज्ञानी रूप से स्थापित करता है और दिखाता है कि भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान&comma; आज की चिकित्सा और मनोविज्ञान में भी कितना प्रासंगिक और प्रभावी हो सकता है। प्रो&period; मृणाल पाठक का यह शोध कार्य उन्हें देश के अग्रणी सृजनात्मक और विज्ञानी शोधकर्ताओं की श्रेणी में स्थापित करता है और बीआइटी मेसरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करता है। उनका कार्य इस बात का प्रेरणास्रोत है कि किस प्रकार भारतीय कला परंपराओं को विज्ञानी रूप में ढालकर वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया जा सकता है। उनकी यह उपलब्धि अंतरविषयक अनुसंधान के लिए नई राहें खोलती है&comma; जो भारतीय ज्ञान प्रणालियों को विश्व मान्यता दिला सकती हैं।<br><strong>Maurya News18 Ranchi&period;<&sol;strong><&sol;p>&NewLine;

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